Friday, 16 March 2018

बुद्धधु बक्से का आगमन(१४)

         बुद्धधु बक्से का आगमन(१४)
    एक छोटे से बक्से से आती आवाज रेडियो में तो सुनते ही थे किंतु एक छोटे से बक्से में चलते फिरते चित्र, गाने और फिल्में देखने की दीवानगी ही कुछ और होती थी।बड़े बच्चों सभी को भाता था ये बक्सा,चित्रहार की दीवानगी तो चरम पर होती ही थी पर रविवार को प्रसारित होने वाली फ़ीचर फिल्म की दीवानगी का आलम तो निराला ही होता था।उस समय मोहल्ले क्या शहर में ही कुछ प्रतिष्ठित लोगों के यहाँ ही टीवी सेट होता था।ऐसे में टीवी वाले परिवार में रविवार शाम बच्चों का जमघट लग जाया करता था।मेहंदी और उसके भाई भी सामने रहने वाले डॉ परिवार के यहाँ रविवार को फिल्म देखने पहुंच गए,उन्हें आदर पूर्वक सोफे पर बैठा दिया गया।सारे परिवार के लोग व उनके परिचित भी चाव से चलचित्र देखने लगे।उनके घर का पूरा जीना बच्चों से भर गया।किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था पर आवाज सुन कर ही खुश थे।कोई गम्भीर मूवी आ रही थी जिसमें संवाद कम थे,अपेक्षित आनंद ना आने पर जीने में भरे बच्चों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया जिससे सब झल्ला उठे।डॉ साहब ने सबसे शांत रहने को कहा किन्तु शोर में कोई कमी नहीं आयी जब डॉ साहब का धैर्य जबाब दे गया तो वो हंटर उठा लाये व हवा में उसे फटकारने लगे।जीने से सब नदारद हो गये ।मेहंदी के बालमन को लगा कहीं उसके साथ भी ऐसा व्यवहार ना हो वो उठ कर घर आ गयी।पापा ने फ़िल्म खत्म होने से पहले आने का कारण पूछा तो उसने सब बयां कर दिया,पापा उसके भोलेपन पर हँस पड़े।तब तक दोनों भाई भी फिल्म  देख कर आ गए और मेहंदी को चिढ़ाने लगे कि हम तो पूरी फिल्म देख कर आये तू क्यों आ गयी।डॉ साहब ने अगले दिन ही बुद्धधु बक्सा क्रय कर लिया कि मेरी लाडली अपने घर पर ही टीवी देखेगी, पूरी रिश्तेदारी में शायद उन्हीं के घर सबसे पहले टीवी आया था।
    

Thursday, 1 March 2018

होली की नादानी(१३)

                होली की नादानी(१३)
    होली के रंगारंग उत्सव पर मौसी और ममेरी बहन आये थे।डॉ साहब के मित्र ख़ूब उत्साहित कि साली साहिबा आयीं हैं उनके साथ होली खेलने को मिलेगी।
    मेहंदी और ममेरी बहन को होली से बहुत हो डर लगता था।वो तरह तरह के लाल हरे रंग पुतवाना फिर उन्हें हटाना, बड़ा ही बोरिंग काम लगता था।तो उन दोनों ने तय किया कि होली नहीं खेलेंगें किन्तु किसी को बतायेंगें भी नहीं कि हमें होली पसन्द नही है।सुबह होते ही डॉ साहब व भाइयों ने रंग घोलना और हुड़दंग मचाना शुरू कर दिया।मम्मी ने उन सब को बाहर भेजा ये कहकर ,जब खाना बन जायेगा तब घर में रंग शुरू करना।दोनों बहनें खाना बना कर निबटी ही थीं तभी डॉ साहब के दोस्तों की टोली आ गयी।ममेरी बहन और मेहंदी घबरा गईं अब तो ये सब हमे पोत देंगें क्या करें।मेहंदी को ध्यान आया घर में एक ख़ूब बड़ा सन्दूक है जिसमें रजाई गद्दे रखे रहते हैं,उसके पीछे इतना स्थान था कि दोनों छिप जातीं।वही छिप कर वो बाहर से आता हुड़दंग सुनती रहीं और डरतीं भी रहीं, कोई उन्हें यहाँ ढूंढ ना ले।जब छिपे छिपे दोनों थक गयी तो धीरे धीरे बाहर निकल कर आयीं,तो क्या देखा ख़ूब रंग हो गया है तथा सब नहाने और धुलाई आदि में व्यस्त हैं। बाहर से आये सब चले गए हैं, उन दोनों से किसी ने पूछा भी नहीं कि कहाँ थी रंग क्यों नही लगाया है।उन दोनों को रंगों से बचने की ख़ुशी भी हो रही थी और दुःख भी हो रहा था कि कोई उनके साथ होली खेलने के लिए लालायित ही नहीं था और वो व्यर्थ में ही छिपी रहीं।कभी कभी ऐसा भी होता है दुनिया के डर कहीं और नहीं हमारे भीतर ही छिपे होते हैं हम खुद को डराते रहते हैं तथा इस कारण जग के कई निराले रंगों का सामना करने से वंचित रह जाते हैं।

Wednesday, 28 February 2018

आम का धमाल(१२)

आम का धमाल(१२)
   मेहंदी को आम बहुत पसंद थे, पके हुये रस से भरे हुये आम।एक दिन वो आम उठा कर आँगन में आ गयी इत्मीनान से खाने के लिए ,अभी एक टुकड़ा ही चखा था कि ना जाने कहाँ से एक बन्दर आ गया और आम छीनने लगा किन्तु मेहंदी तो मेहंदी थी उसने भी आम नही दिया ।अब दृश्य कुछ यूँ बना मेहंदी आम खाते हुए आगे आगे और उसका फ्रॉक पकड़े हुए बन्दर पीछे पीछे।मम्मी पूजा कर रही थी मेहंदी ने उन्हें आवाज़ दी .....मम्मी बन्दर से बचाओ।या तो माँ ने सुना नहीं या उनके लिए पूजा अधिक महत्वपूर्ण थी।मेहंदी की चीखें सुनकर पापा और बड़े भाई कर आये तथा सारा माजरा समझ कर मेहंदी से कहा कि आम फेंक दो। पर नही आम का लोभ इतनी आसानी से कैसे छूट जाये,आख़िर पापा और भाई ने बन्दर को भगा दिया तब मेहंदी ने चैन से आम खाया। एक सवाल किन्तु मेहंदी के जहन में घूमता रहा यहीं पास में पूजा करती मम्मी ने उसकी आवाज नही सुनी और अंदर दूर कमरे में बैठे पापा व भाई ने सुन ली।क्या एक माँ के लिये सन्तान से बढ़कर भी कोई और महत्वपूर्ण कार्य हो सकता है।माँ क्यों नही आयीं उसे बचाने........आख़िर क्यों...?

Tuesday, 27 February 2018

पिता - सुरक्षा कवच (११)

   " पिता-सुरक्षा कवच"
   डॉ साहब मिलनसार तथा व्यवहारिक हंसमुख स्वभाव के व्यक्ति थे अतः उनका मित्रता का दायरा भी विस्तृत था,हालाँकि रोगियों से फुर्सत कम ही मिलती थी फिर भी व्यवसायिक तथा व्यक्तिगत जीवन में संतुलन बनाए रखते थे।उनके घर आने जाने वाले मित्र 4 बरस की मेहंदी को भी ख़ूब लाड़ किया करते थे।ऐसे ही एक डॉ मित्र ने एक बार मेहंदी के पेट पर बर्थमार्क छूकर एक ऐसी अप्रत्याशित बात कही जो मेहंदी को बड़ी अटपटी लगी उसने पापा को बताई ।पापा ने ध्यानपूर्वक सुना और उसके बाद वो अंकल कभी घर नहीं आये, क्यों नही आये ये जानने की आवश्यकता मेहंदी को कभी अनुभव नही हुई वो तो खुश थी कि अटपटे अंकल अब नहीं आते हैं।साथ ही पापा पर दृढ़ विश्वास कायम हो गया कि उसके पापा उसकी हर परिस्थिति में रक्षा करने की क्षमता रखते हैं, उस दिन से मेहंदी की हर छोटी बड़ी समस्या को पापा की अदालत में ही पेश किया जाने लगा और मेहंदी को उनके फैसले से कभी निराश नहीं होना पड़ा।इतनी छोटी आयु में ही उसे समझ आ गया कि पापा ही उसका सुरक्षा कवच हैं।उसके पापा ही उसके मित्र भी थे जिन्हें वो निसंकोच सब बता देती थी।
टिप्पणी: हर पिता को ऐसा ही होना चाहिये बच्चों की बातों को उपेक्षित ना कर पूरे ध्यान से सुन समाधान करना चाहिये, पिता या माता बच्चों से दोस्ताना व्यवहार करेंगें तो बच्चे गलत संगत में जाने से बच सकते हैं विशेषकर एकल परिवारों में .....



Friday, 23 February 2018

खाल तुम्हारी हड्डी हमारी(१०)

                खाल तुम्हारी हड्डी हमारी"
   मेहंदी सरल स्वभाव की थी किंतु पढ़ने में कुशाग्र थी, इसके भाइयों को पढ़ाने आचार्यजी आते थे वो जो सवाल भाइयों को करने देते थे उन्हें मेहंदी उनसे पहले ही झट बता देती थी।पिता तो अपनी होनहार बाला पर वारी वारी जाते थे।एक बार आचार्यजी ने कुछ सवाल करने को दिये जिन्हें मेहंदी ने झट बता दिया किंतु छोटे भाई ने लिख कर भी गलत कर दिया।आचार्यजी का पारा चढ़ गया और उन्होंने कहा कि छोटी बहन ने ऐसे ही बता दिया और तुमसे लिख कर भी सही ज़बाब नहीं आया तथा एक झापड़ लगा दिया, छोटे भैया को भी आक्रोश आ गया उन्होंने कुर्सी पर खड़े होकर कस कर चपत आचार्यजी के लगा दी।उन्होंने मम्मी को बुलाया व सब हाल बताया मम्मी कुछ कहतीं तभी जीना चढ़ते हुए पापा की पदचाप गूँजी। वस्तुस्थिति पता चलने पर डॉ साहब ने अपने बेटे को ख़ूब पीटा ये कहते हुए कि गुरु पर हाथ उठाता है तेरी हिम्मत कैसे हुई गुरूजी पर हाथ उठाने की। आचार्यजी तो स्वयं डॉ साहब का गुस्सा देख हैरान हो गये और कहने लगे जाने दीजिए नासमझ बालक है धीरे धीरे समझदार हो जायेगा।
   डॉ साहब ने कहा कि आज से इसे जितना पीटना हो पढ़ाने के लिए पीटियेगा ये कुछ नहीं कहेगा । खाल तुम्हारी हड्डी हमारी , जितनी सख़्ती ज़रूरी हो पढ़ाने के लिये वो आजमाइयेगा। उस दिन के बाद भैया का चुलबुलापन तो बरक़रार रहा किन्तु वो पढ़ाई में भी मन एकाग्र करने लगे।

Sunday, 11 February 2018

झूला बना जिंदगी व मौत का झूला(९)

     लवली से दोस्ती होने के साथ ही मेहंदी उसके साथ ही विद्यालय से घर वापस आने लगी।जाती भाइयों के साथ थी और आती लवली के साथ।एक दिन लवली उसे अपने घर ले गयी उसके बरामदे में झूला लगा  हुआ था,ये देख मेहंदी तो ख़ुशी से नाच उठी,फटाक से झूले पर बैठी और खूब झोंठे लिये।लवली के घर में उपस्थित चाची व उसकी मम्मी ने भी उसे ख़ूब लाड़ किया और कहा जब मन हो झूला झूलने आ जाया करो।चाहो तो छुट्टी में रोज़।जी आंटीजी मेहंदी तो प्रसन्न हो गयी किन्तु लवली को मेहंदी के इतने लाड़ अच्छे नहीं लगे।वो मेहंदी से कतराने लगी।उधर वंश मेहंदी के लिए रोज सीट रखता कोई उस सीट पर बैठने की कोशिश करता तो उससे हाथापाई भी करता किन्तु मेहंदी उससे अधिक लवली से बात करने को लालायित रहती थी।एक दिन सुबह विद्यालय जाने से पूर्व मेहंदी ने मम्मी को बता दिया कि मैं आज देर से आऊंगी लवली के घर झूला झूलने जाऊंगी।उस दिन भी लवली  मेहंदी को उपेक्षित करती रही परन्तु  मेहंदी को इतनी समझ ही कहाँ थी,उसने लवली से कहा कि वो उसके घर चलेगी झूलने,लवली ने बेमन से अच्छा कह दिया किन्तु छुट्टी में जल्दी से बाहर चली गयी।वंश मेहंदी का हाथ पकड़े छुट्टी में बाहर निकला पर वो तो लवली को ही ढूंढ रही थी तभी उसे लवली आगे जाती हुई दिखी,मेहंदी वंश के मना करने के पश्चात भी आनन फ़ानन हाथ छुड़ा कर भागी और सामने से आती किसी गाड़ी से टकरा कर गिर गयी।मूर्छित होते होते मेहंदी ने सुना कोई कह रहा था अरे ये तो डॉ नरेश की बेटी है और जब मेहंदी को होश आया तो पापा उसके उपचार में लगे थे।सौभाग्यवश मेहंदी को अधिक चोट नही आई थी किन्तु उस दिन से वंश सहम गया था शायद उसे लग रहा था कि उसकी हाथ पकड़ने की जिद की वजह से मेहंदी भागी वरना वो हल्के हल्के जाती और उस दिन से वंश की मासूम मोहब्बत  सहम कर ख़ामोश हो गयी।
      

Monday, 5 February 2018

विद्यालय का प्रथम दिवस(८)



मेहंदी की शिक्षा दीक्षा प्रारम्भ हो गई, उसकी पढ़ने में बेहद रूचि थी।जब भाई पढ़ने जाते थे तब वह भी विद्यालय जाने के लिये रोती थी।आखिर वो दिन आया जब वो पहले दिन विद्यालय गयी।इतने सारे बच्चे एक साथ वो तो घबरा कर भैया के पीछे प्रार्थना की पंक्ति में लग गयी,भैया ने बताया नर्सरी की पंक्ति दूसरी है पर वो नहीं हटी।भैया उसे उसकी कक्षा में सबसे आगे की सीट पर बैठा आये। पास में बैठी लड़की लवली व लड़के वंश से परिचय हुआ मेहंदी ल शब्द का उच्चारण र कह कर करती थी उसने लवली को रवरी कह दिया ये सुन लवली का मुँह बन गया पर भोली मेहंदी उसे अपनी सहेली मानने लगी। उनकी कक्षा अध्यापिका के बड़े बड़े नाखून देख कर मेहंदी का तो जैसे खून ही जम गया।पर जब अध्यापिका(जिन्हें सब मैम कह रहे थे) ने अपने हाथों की विभिन्न मुद्राएं बना कर ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार सिखाई उसका भय भी जाता रहा।ये तो उसने घर पर भी सीखी थी जब उसके भाइयों को घर पर सर पढ़ाने आते थे तब।उसने वो कविता एक्शन सहित दोहरा ली।मैम भी खुश हो गईं।पता लगा कि वंश मैम का बेटा है,मेहंदी से हाथ मिला कर उसने उसे अपनी दोस्त बना लिया और कहा कि तुम्हारे लिये सबसे आगे की सीट रोज रखूँगा। इस तरह एक प्यारा दिन विद्यालय में बिता कर मेहंदी घर आकर पापा की प्रतीक्षा करने लगी और उनके आने पर सारी बातें विस्तार से बताईं । ट्विंकल ट्विंकल सुनाई उसका उत्साह देख डॉ साहब भी निहाल हो गये।

Wednesday, 31 January 2018

स्थानांतरण(७)

स्थानांतरण के संग स्थान ही नहीं बदलता रहता बदल जाता है समूचा परिवेश,मन के जुड़ाब,आबोहवा आस पड़ोस, घर की संरचना,पुनः नये घर को विन्यासित करना जहाँ नई उमंग देता है वहीं पीछे छोड़ दिए गए घर और पड़ोस की यादें मन को झकझोरती रहती हैं।लड़कियाँ तो मायके को छोड़ ससुराल आती हैं पर मायके से सम्बन्ध जुड़ा रहता है किंतु स्थानांतरण के पश्चात तो कुछ परिजन जो बहुत निकट हो गए होते हैं दुबारा कभी मिलते है कभी नहीं भी मिलते जैसे यात्रा के समय कुछ सहयात्रियों से अच्छी जान पहचान हो जाती है और फिर वो अपने रास्ते हम अपने रास्ते।
        मेहंदी तो शैशवावस्था में थी पता नहीं उसे उस परिवार की हुड़क लगी होगी या नहीं जिन्हें सौंप कर माँ सारे घर के कार्य निबटा लिया करती थीं।शिशु कुछ कह नहीं सकता एवं बड़े होने पर तो उसे स्वयं भी नहीं पता होता कितने परिजनों का स्नेह उसे मिला है।पता नहीं डाकू वाली घटना का प्रभाव था, दुर्घटना के बाद अपनों के निकट होने की आवश्यकता अनुभव करना या कुछ अन्य कारण, डॉ साहब का स्थानांतरण अपने गृहजनपद के निकट ही हो गया।कुछ लोगों से बिछड़ने की पीड़ा तथा अपने रिश्ते नातों के करीब आने की ख़ुशी के साथ नई जगह अपनी गृहस्थी सज़ा दी गयी।मेहंदी के जीवन का भी नया अध्याय शुरू होने वाला था।अब बाल्यावस्था में कदम रखने के संग ही विद्यार्थी जीवन का भी शुभारम्भ होने वाला था।

दुर्घटना(६)

नित्य सैकड़ों हज़ारों सड़क दुर्घटनाएं होती रहती है, समाचारपत्रों में पड़ते रहते हैं किन्तु जब अपने पर बितती है तो उसकी विकरालता का अनुभव होता है।
      डॉ साहब कार्यालय के कार्य से कुछ सहकर्मियों के संग कार्यालय की कार व चालक के साथ लखनऊ जा रहे थे।अचानक सामने से आती दूसरी कार से टक्कर हो गई।भीषण दुर्घटना थी,चालक के सिवा सभी को गम्भीर चोटें आईं।डॉ साहब के भी हाथ की हड्डी टूट गयी तथा और भी घाव हो गए।चालक ने ही हिम्मत करके सबको लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया।सबका ध्यान रखा जाने लगा किन्तु चालक के अंदरूनी रक्तस्राव होता रहा जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गयी,सबके लिए यह स्थिति अप्रत्याशित थी कि जिसके कारण सबको सही समय चिकित्सा मिली वही इस जग में नहीं रहा, बहुत ही दुःखद.....यही जीवन की भंगुरता है ।
     डॉ साहब के सभी रिश्तेदार आ गए सब जोर देने लगे अपने घर के निकट ही स्थानांतरण करा लो।फ़िलहाल डॉ साहब सीधे हाथ में बंधे प्लास्टर के साथ घर आ गए तथा कई कार्य उलटे हाथ से करने लगे जिन्हें करने का उन्हें इतना अभ्यास हो गया कि सीधा हाथ सही होने के पश्चात भी उलटे हाथ से करते रहे जैसे दांत मांजना और दाढ़ी बनाना।मेहंदी जब बड़ी हुई थी तो उसे पापा को उलटे हाथ से कम करते देखना बड़ा अच्छा लगता था और उनके हाथों पर पड़े टाँकों के निशान भी वो रोज छूती थी।
    

Saturday, 27 January 2018

डॉक्टर व डाकू (५)

डॉक्टर व डाकू
मेहंदी जब शिशुवस्था में ही थी उसके पिता की नियुक्ति ऐसे क्षेत्र में हो गयी जहाँ उस समय डाकुओं का वर्चस्व था।सर्दियों की एक गहन रात्रि को द्वार पर दस्तक हुई
माँ तो तीन बच्चों के लालनपालन में थकी गहन निद्रामग्न थीं,डॉक्टर साहब ने द्वार खोला तो डाकू खड़े थे।व्याकुल होते हुए डॉ साहब ने पूछा क्या काम है
उन्होंनें कहा अपने औजार उठा और हमारे संग चल ।चमचमाते रामपुरी के फल को देख प्रतिरोध करना मूर्खता थी और वो हमेशा मानते थे हमारा कार्य रोगी को ठीक करना हो भले ही वो कोई भी हो।
     आँखों पर पट्टी बांध अपने अड्डे पर ले गए उनके एक साथी को गोली लगी थी। डॉ साहब ने सावधानीपूर्वक गोली निकाल दी।डाकू प्रसन्न होकर एक नोटों से भरी सन्दूकची ले आये तथा बोले जितने मर्जी हो ले लो।डॉ साहब ने नानुकर करी तो एक बड़ी घनी मुछों वाला (जो शायद उनका सरदार था) बोला अपनी खुशी से दे रहे है संकोच मत करो।डॉ साहब ने सोचा यदि अधिक नोट उठाये तो इन्हें लगेगा मैं लालच में आ गया और कम उठाये तो भी चिढ़ सकते हैं ,पशोपेश में डॉ साहब ने एक मुट्ठी नोट भर जेब में धर लिए।
       आँखों पर पुनः पट्टी बांध वापसी हो गयी।सुबह जागने पर पत्नी से किस्सागोई की तो वो कांप गयी।कहने लगीं मुझे क्यों नही जगाया। तब उन्होंने हंस कर कहा तुम रात भर चिंतित रहतीं इसलिये.....रात के लाये रूपये पत्नी को सौप दिए,जब गिने तब वो लगभग एक महीने के वेतन के बराबर थे।डॉ साहब ने परिहास किया वाह ऐसे मरीज मिलते रहें।
     पत्नी ने उनके मुँह पर ऊँगली रख दी और कहा मुझे आपकी सलामती से अधिक कुछ नहीं चाहिये प्रभु ना करे आप पर कभी भी कोई विपदा आये।
    ये किस्सा फिर तो परिजनों को बताने हेतु रोमांचक वार्तालाप बन गया।मेहंदी ने बड़े हो जब ये किस्सा सुना तो अपने पापा से पूछा आप क्यों गये आपको नहीं जाना चाहिए था।तब उसे गोदी में ले बड़े प्यार से डॉ साहब ने समझाया कि हम पढ़ाई पूरी करके शपथ लेते हैं कि इलाज करने में कोई भेदभाव नहीं करेंगें।मरीज तो मरीज होता है और हमारे पास बेहद आस लेकर आता है ।हमें अपना काम करना चाहिए और उन्हें न्याय प्रक्रिया के तहत दण्ड मिलेगा ।