बचपन भी क्या खूब ही होता है ,संसार की हर देखी अनदेखी को प्रयुक्त करने की जिज्ञासा, संभवतः इसी जिज्ञासा के कारण ही मानव का विकास हुआ और वो नित नवीन आविष्कार करने में रत है।
ऐसी ही एक विचित्र वस्तु दिखी, धूम्रदंडिका, जिसे मुख में लगा कर धुआं बाहर फेंका जाता था , बच्चों हेतु बहुत ही अलग आकर्षक वस्तु जिसे घर के बड़े बच्चों को छूने भी नहीं देते थे पर स्वयं फूफू करते रहते थे।
एक दिन डॉ साहब के मित्र भूलवश सिगरेट का पैकेट रह गया , बस मँझले भैया तो फुर्तीले थे ही पैकेट गया उनके कब्जे में।
छुट्टी के दिन उसका प्रयोग किया गया, बड़े भैया मंझले भैया और पड़ोस के उनके मित्र तीनों छिप कर खेतों के पास पहुंचे फूफू करने, खांसते खांसते बुरा हाल फिर भी किसी तरह एक धूम्रदंडिका फूंक ही दी।
इतना साहस दिखा दिया किंतु अब बारी थी घर पर पिताजी का सामना करने की क्योंकि डॉ साहब की नजरों से कुछ नहीं छिपता था।
सिगरेट के कश तो ले लिए अब डर डर कर किसी तरह घर जाने लगे तभी एक नन्ही सी क्यारी में धनिया उगा देख कर भैया बोले धनिया पत्ते चबाने से दुर्गंध नहीं आती आओ धनिया चबाते हैं, तीनों ने धनिया चबाना आरंभ कर दिया अब बड़े भैया को लगा पापा डांटेंगे धनिया कहां गायब हो गया तो कम खाओ, बड़े भैया और मित्र ने धनिया कम खाया किन्तु चतुर मंझले भैया ने अच्छे से धनिया खा लिया, डॉ साहब के मित्र से सिगरेट के पैकेट का जिक्र तो हो है गया था अब बालकों के हाव भाव से पता लग गया कुछ तो गड़बड़ है, उन्होंने कड़क कर पूछा सिगरेट किसने पी, तीनों ने ना में सिर हिला दिया, डॉ साहब ने कहा मुंह खोलो और गंध सूंघी, बड़े भैया व पड़ोसी मित्र पकड़े गए मंझला भैया के मुंह की गंध धनिया से मिट गई थी, पड़ोसी मित्र के पिताजी को बुलाया गया, बड़े भाई व मित्र जी अपने अपने पिताओं द्वारा अदरक की भांति खूब कूटे गए, दोनों को ऐसा सबक मिला कि जीवन भर सिगरेट पीने से तौबा कर ली।
मेहंदी सोचती है काश मंझले भैया इतने चतुर ना होते वो भी कुट कर सिगरेट से तौबा कर लेते तो धूम्रपान के कारण आगे चल कर अल्पायु में उनकी असामयिक मृत्यु नहीं होती। काश....... सिगरेट का कश किसी के जीवन में ना आए।
