Thursday, 30 October 2025

सिग्रेट का कश (३६)



 

 बचपन भी क्या खूब ही होता है ,संसार की हर देखी अनदेखी को प्रयुक्त करने की जिज्ञासा, संभवतः इसी जिज्ञासा के कारण ही मानव का विकास हुआ और वो नित नवीन आविष्कार करने में रत है।

      ऐसी ही एक विचित्र वस्तु दिखी, धूम्रदंडिका, जिसे मुख में लगा कर धुआं बाहर फेंका जाता था , बच्चों हेतु बहुत ही अलग आकर्षक वस्तु जिसे घर के बड़े बच्चों को छूने भी नहीं देते थे पर स्वयं फूफू करते रहते थे।

  एक दिन डॉ साहब के मित्र भूलवश सिगरेट का पैकेट रह गया , बस मँझले भैया तो फुर्तीले थे ही पैकेट गया उनके कब्जे में।

   छुट्टी के दिन उसका प्रयोग किया गया, बड़े भैया मंझले भैया और पड़ोस के उनके मित्र तीनों छिप कर खेतों के पास पहुंचे फूफू करने, खांसते खांसते बुरा हाल फिर भी किसी तरह एक धूम्रदंडिका फूंक ही दी।

  इतना साहस दिखा दिया किंतु अब बारी थी घर पर पिताजी का सामना करने की क्योंकि डॉ साहब की नजरों से कुछ नहीं छिपता था।

     सिगरेट के कश तो ले लिए अब डर डर कर किसी तरह घर जाने लगे तभी एक नन्ही सी क्यारी में धनिया उगा देख कर भैया बोले धनिया पत्ते चबाने से दुर्गंध नहीं आती आओ धनिया चबाते हैं, तीनों ने धनिया चबाना आरंभ कर दिया अब बड़े भैया को लगा पापा डांटेंगे धनिया कहां गायब हो गया तो कम खाओ,  बड़े भैया और मित्र ने धनिया कम खाया किन्तु चतुर मंझले भैया ने अच्छे से धनिया खा लिया, डॉ साहब के मित्र से सिगरेट के पैकेट का जिक्र तो हो है गया था अब बालकों के  हाव भाव से पता लग गया कुछ तो गड़बड़ है, उन्होंने कड़क कर पूछा सिगरेट किसने पी, तीनों ने ना में सिर हिला दिया, डॉ साहब ने कहा मुंह खोलो और गंध सूंघी, बड़े भैया व पड़ोसी मित्र पकड़े गए  मंझला भैया के मुंह की गंध धनिया से मिट गई थी, पड़ोसी मित्र के पिताजी को बुलाया गया, बड़े भाई व मित्र जी अपने अपने पिताओं द्वारा अदरक की भांति खूब कूटे गए, दोनों को ऐसा सबक मिला कि जीवन भर सिगरेट पीने से तौबा कर ली।

  मेहंदी सोचती है काश मंझले भैया इतने चतुर ना होते वो भी कुट कर सिगरेट से तौबा कर लेते तो धूम्रपान के कारण आगे चल कर अल्पायु में उनकी असामयिक मृत्यु नहीं होती। काश....... सिगरेट का कश किसी के जीवन में ना आए।


पापा मुख्य अतिथि- गौरान्वित मेहंदी (३३)


Tuesday, 9 June 2020

किराये की साइकिल(३५)

  • साइकिल की सवारी सभी ने पढ़ी होगी पढ़ कर काफी लोगों को समानता भी लगी होगी। किन्तु साइकिल की सवारी कभी भी सरल नही होती, और यदि घर मे साइकिल ना हो तब तो और भी। एक दौर ऐसा भी था जब साइकिल होना भी बड़ी बात होती थी किसी किसी घर मे ही साइकिल होती थी वो भी पूरे आकार की ।ऐसे में बच्चों को साइकिल सीखने के लिए एक ही उपाय होता था...किराये की साइकिल, जो कुछ पैसों के किराये पर एक घण्टे के लिए मिल जाती थीं।दोनों भाई किराये पर साइकिल लाते थे तथा हवा से बातें करते। एक दिन मेहंदी ने भी साइकिल चलाने की सोची किन्तु चलाने का प्रयास करते ही धूल धूसरित हो गयी।उसके बाद किसी दिन दुबारा साहस ही नही किया मेहंदी ने साइकिल चलाने का। दोनों भाई किराये पर साइकिल लाकर खूब सन्तुलन बनाना सीख गए। उसके बाद पूरे आकार की साइकिल भी कैंची रूप में चलाने लगे फिर धीरे धीरे पापा के स्कूटर पर भी गाहे बगाहे हाथ आजमाने लगे। पर मेहंदी वहीं ठिठकी रही साइकिल से गिरने के डर से सहमी हुई। उसे कोई प्रेरित नही कर पाया, और फिर प्रेरणा मिली कई साल पश्चात। जब उसकी ममेरी बहन जो दिल्ली में पढ़ती थी उसने उसे साइकिल सीखाने की ठान ली। तब तक साइकिल घरों में आम हो चलीं थी साथ ही लेडीज़ साइकिल भी कॉमन हो गयी थीं। जिस साइकिल पर उन्होंने सीखा उसके ब्रेक लगते नहीं थे चेन बार बार उतर जाती थी, घण्टी भी सही से नहीं बजती थी। लेकिन अब मन में लगन थी। और जब लगन लग जाये तो असम्भव कार्य भी संभव हो जाते हैं फिर साइकिल सीखना तो आसान ही था।इस तरह मेहंदी ने सीखी साइकिल चलाना और उसे सीखने में क्या क्या वाकयात हुए वो मेहंदी के उस उम्र में पहूँचने के बाद वर्णित किये जायेंगे।

Monday, 8 June 2020

मूवी से मिली सीख(३४)

उन्ही दिनों एक मूवी आयी क्रांति उसकी खूब धूम मची हुई थी।डॉ साहब अपनी श्रीमती जी को साड़ियां दिलाने दुकान पर लेकर गए वहां भी क्रांति साड़ियों की धूम थी।डॉ साहब को अपने पसंदीदा नीले रंग की साड़ी पसन्द आ गयी और श्रीमती जी को भी किन्तु मेहंदी दूसरी साड़ी को लेने के लिए कहने लगी। मम्मी पापा समझ नही पाए कम बोलने वाली मेहंदी ने आज ऐसी फरमाइश क्यों की। पर दुकानदार बाल मनोविज्ञान समझ गया। वो डॉ साहब से बोला मुझे पता है बिटिया ये साड़ी क्यों पसन्द कर रही है और हँसते हुए हरे रंग का एक छोटा सा पर्स जिस पर क्रांति लोगो सहित लिखा था मेहंदी की तरफ बढ़ा दिया। बिटिया ये उपहार रख लो जो साड़ी तुम्हारी मम्मी ने ली है उसके साथ भी ये पर्स मिल जाएगा। मेहंदी खुशी से ठुमक उठी, घर आते ही सबसे पहले गुल्लक से रुपये निकाल कर पर्स में रखे फिर सब सहेलियों को नया पर्स इठलाते हुए दिखाने निकली। अगले दिन डॉ साहब ने क्रांति मूवी देखने का कार्यक्रम तय किया। मम्मी पापा के साथ मेहंदी मूवी देखने गयी।अपने नए पर्स के साथ मेहंदी मूवी देखने गयी। आगे की सीट पर कुछ लम्बे लोग बैठे थे तो मेहंदी को मूवी देखने में दिक्कत होने लगी उसने खड़े होकर मूवी देखना शुरू कर दिया उसका पर्स हाथ मे लटका आगे की सीट छू रहा था पर मेहंदी फ़िल्म में खोई हुई थी।घर आकर दोनों भाइयों को मूवी के संवाद सुना खूब चिढ़ाया।दोनों भाई भी मूवी की जिद करने लगे ,डॉ साहब ने उन्हें भी मूवी देखने भेज दिया। मेहंदी ने पर्स खोल कर देखा तो वो खाली उसका दिल धक से रह गया .....मेरी सारी बचत खत्म। वो रुआंसी हो पापा के पास पहुंची और पर्स दिखया , पापा ने पूछा पर्स कहीं थोड़ी देर को रखा तो नही था, मेहंदी ने कहा नही फिर उसे ध्यान आया फ़िल्म देखते समय आगे सीट पर बैठे लड़को के मध्य पर्स लटका हुआ था उसने पापा से कहा शायद उन लड़कों ने निकाल लिया हो। पापा ने पूछा कितने रुपये थे ? मेहंदी ने बता दिए और अपने रुपये खोने के दुख में गुमसुम तथा रुआंसी हो गयी। बस एक बात की तसल्ली थी कि दोनों भाई घर पर नहीं थे वरना उसे बेबकूफ लापरवाह जाने क्या क्या कह कर तंग करते। वो गुमसुम बैठी थी तभी डॉ साहब उतने ही रुपये लेकर मेहंदी के पास आये जितने उसके पर्स में थे और बोले मैंने तुम्हारे पर्स से मूवी देखने जाने से पहले निकाल लिए थे क्योंकि मुझे डर था कहीं रुपये चोरी ना हो जायें, मेहंदी खुशी के मारे पापा से लिपट गयी। पापा ने मेहंदी को समझाया किस तरह रुपये पैसों का ध्यान रखना चाहिए, दुनिया मे अच्छे लोग हैं तो ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों के धन को चुरा लेते हैं।मूवी देखकर आयी मेहंदी को मूवी से तो देशभक्ति की शिक्षा मिली ही साथ ही रुपये सम्भालने की इतनी समझ मिली कि आने वाले समय मे उसके हाथ से एक चवन्नी भी नहीं खोती थी। मूवी देख जब दोनों भाई आये तो फ़िल्म के एक किरदार की तरह हाथ मे स्टील का गिलास पहन कर और भी सम्वाद बोल बोल और गानों पर अभिनय कर, चना जोर गरम करते हुए खूब धमाल मचाया।कई दिन तक इस मूवी की धूम मची रही। पता नहीं मेहंदी के रुपये वाकई चोरी हुए थे या डॉ साहब ने उसे शिक्षा देने के लिये पर्स से निकाले थे पर सच्चाई जो भी हो डॉ साहब का शिक्षा देने का अंदाज अनूठा ही था।

Saturday, 30 March 2019

नवाब साहब से हाथ मिलाना(३२)

              नवाब साहब से हाथ मिलाना(३२)
     नई जगह आने के बाद नित्य कुछ नवीन घटित होता रहता है कभी कोई नई जगह देखने को मिलती है कभी नई तरह के लोगों से मिलने को मिलता है ।विद्यालय तो नया था ही नई सखियां बन गई थी 6 साल की बच्चे के लिए यह सब सामंजस्य करने बहुत ही सरल थे ,क्योंकि बच्चे कच्ची मिट्टी की भांति शीघ्र ही नए परिवेश में ढल जाते हैं मेहंदी में भी नये विद्यालय नई सखियों के मध्य तारतम्य बैठा लिया था। मेहंदी के पापा को बच्चों को घुमाने फिराने का भी खूब शौक था। दशहरे का मौका आया रावण का पुतला लगा ,खूब आतिशबाजी की तैयारियां थी,उस दिन दशहरे के मुख्य अतिथि थे जिले के सांसद और उस रियासत के नवाब साहब। जब भी कोई प्रमुख व्यक्ति ऐसे मौकों पर आता है तो डॉक्टर की ड्यूटी लगती है डॉक्टर साहब की भी ड्यूटी लगी थी बच्चे भी पहुंच गए मेले में 6 साल की मेहंदी को एहसास ही नहीं था कि पापा ड्यूटी कर रहे हैं वह तो मेले का आनंद ले रही थी अपने भाइयों के साथ और आनंद लेने के बाद पापा के पास पहुंच गई ।पापा ने भी मेहंदी को नवाब साहब से मिलाया उन से हाथ मिलाने को कहा नवाब साहब ने मेहंदी की तरफ हाथ बढ़ा दिया।मेहंदी ने सकुचाते हुए हाथ मिला लिया। उसके लिए यह कोई महत्व की बात नहीं थी कि वह नवाब हैं या सांसद हैं, वह तो पापा का ही कोई परिचित समझकर उनसे नमस्ते कर रही थी। जब मेहंदी बड़ी हुई तब उस एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी शख्सियत से हाथ मिला रखा है ।।           कितना अच्छा होता है ना वह मासूम प्यारा भोला सा बचपन जहां ना कोई बड़ा होता है ना कोई छोटा होता है ।  माता पिता के निर्देशानुसार  ही हमारा परिचय विभिन्न क्षेत्रों से होता है जिसे सब अपनी बुद्धिअनुसार समझते हैं। समय के नए-नए आयाम मेहंदी की आंखों के आगे खुल रहे थे और वह सीख रही थी सब कुछ नया ऐसे ही जीवन धारा चलती रहती है। कोई भी मां के पेट से सीख कर नहीं आता यह दुनिया ही उसे सब कुछ सिखा कर पारंगत बना देती है।
   मासूम सी मेहंदी दुनिया में आकर कुछ कुछ सीखने लगी थी पर अभी भी वह काफ़ी काफी नादान थी ।वह मेहंदी जो विद्यालय से आकर सर्वप्रथम गृह कार्य करती थी अब थोड़ी ढिलाई करने लगी थी। एक दिन डॉक्टर साहब के टोकने पर वह कह बैठी कि यहां तो मेरी नई-नई सहेलियां बन गई है इसलिए मैं उनके साथ खेलने में लगी रहती हूं। 6 साल की बच्ची की वह मासूम बात सब रिश्तेदारों को बड़ी हंसी हंसी बताई जाती थी, तब मेहंदी को एहसास हुआ कि कुछ बोलने से पहले सोचना पड़ता है नहीं तो परिहास बनता है ।यह एक छोटी सी बात मेहंदी को सोच समझ कर बोलने की कला सिखा गयी।

Friday, 1 February 2019

मूवी का चस्का ( ३३)

मूवी का चस्का(३३)
  1. चलचित्र, मूवी,या फिल्में जिस नाम से भी पुकारा जाए रहेगा भारतीय जनमानस से जुड़ा एक अहम हिस्सा ही। कुछ चीजें जीवन से इस कदर जुड़ी होती है कि वह हमें अलग से एक उद्योग लगता ही नहीं, लगता है यह हमारे जीवन का ही एक अभिन्न अंग है जैसे पढ़ना लिखना, घूमना फिरना, रिश्तेदारों से मिलना, त्यौहार मनाना, जीवन में दिनचर्या में आरंभ से ही सम्मिलित रहता है, ऐसे ही हिंदी फिल्में देखना भी जीवन में एक कार्य की तरह ही जुड़ा रहता है ।डॉ साहब को टैक्स फ्री फिल्में देखने और दिखाने का बड़ा ही चाव था । उनका कहना था कि सरकार इन फिल्मों को टैक्स फ्री इसलिए करती है क्योंकि इसमें समाज के लिए कोई आवश्यक संदेश होता है, और उस आवश्यक संदेश को देखने के लिए हमें यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए..... मेहंदी को तो बस पापा का साथ चाहिए होता था, चाहे वह टैक्स फ्री फिल्म दिखाएं या कला फिल्म अथवा मसाला फिल्म दिखाएं , मम्मी पापा और मेहंदी तीनों जाया करते थे टैक्स फ्री फिल्में देखने स्कूटर से।
  2. छोटा भाई बहुत ही छोटा था वह घर पर रह जाता था मुरारी नाम के सेवक के पास तथा दोनों बड़े भाई डॉक्टर साहब से डील कर लेते थे कि वह मसाला फिल्म देखेंगे, टैक्स फ्री फिल्म नहीं देखेंगे, और प्रसिद्ध महानायक की फिल्म देख कर आया करेंगे ।मेहंदी तो देखकर आती थी ब्रजभूमि, दुल्हा बिकता है, पशु संग्राम आदि जैसी टैक्स फ्री फिल्में तथा दोनों भाई देख कर आते थे महानायक की खुद्दार, सत्य पे सत्ता, नसीब ,देश प्रेमी,नमक हलाल जैसी मसाला फिल्में और घर आकर सबको जलाते हुए ढिशुम ढिशुम करते, फिल्मों के प्रसिद्ध संवाद सुनाते थे। मेहंदी रुआंसी हो जाती तो डॉक्टर साहब उसके मन की बात समझ जाते और फिर वह लोग भी देख कर आते ,बॉलीवुड की हिट मसाला फिल्म।इस तरह मेहंदी दोनों फिल्म देख लेती थी मसाला फिल्म भी और टैक्स फ्री फिल्म भी।  उसके बाद तीनो भाई बहन मिलकर उस फिल्म के खूब डायलॉग बोलते ,ढिशुम ढिशुम करते हुए गाने गुनगुनाते घूमते ।
  3.    कोई रिश्तेदार आता तो उनको भी मूवी दिखाने ले जाया जाता ,उन दिनों बाहर खाना खाने का इतना रिवाज नहीं था तथा टीवी पर भी अधिक प्रोग्राम नहीं आते थे ।गर्मियों की छुट्टियां आदि में जब भी कोई रिश्तेदार आता था तो मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन बॉलीवुड फिल्म ही होती। पूरी पूरी फैमिली रिक्शा में भरकर फिल्में देखने जाती थी और फिर कई दिन तक चर्चा होती थी। खास तौर पर फिल्म के एक्शन और संवादों की धूम मची रहती थी। इसके अलावा फिल्म के गानों की भी अंताक्षरी होती और टेप रिकॉर्ड पर फिल्म के गानों की कैसेट सुनी जाती। जब तक एक फिल्म का खुमार उतरता था तब तक दूसरी फिल्म आ जाती थी और फिर वही सब उसके साथ होता था।
  4.  एक अलग ही दौर था जब छोटी-छोटी खुशियों में एक मूवी देखना भी एक बहुत बड़ी लग्जरी माना जाता था और टीवी पर आने वाली रविवारिय मूवी भी इतनी ही शिद्दत से देखी जाती चाहे कैसी भी फिल्म को टीवी पर देखने का एक अलग ही क्रेज होता था। जल्दी जल्दी से बच्चे पढ़ाई करके बैठ जाते थे शाम को मूवी देखेंगे महिलाएं भी खाने की तैयारी करके रख देती कि मूवी देखते समय बीच में उठना ना हो , तथा सभी उस फिल्म को बहुत उत्साहित होकर देखा करते थे ।
  5. उस समय टीवी भी बहुत ही कम घरो में होते थे तथा खिड़की पर आसपास के बच्चों का जमघट लग जाता था जो फिल्म देखते समय खूब हल्ला गुल्ला करते थे। सुनने देखने में व्यवधान तो होता था पर उनके उत्साह को देखकर अच्छा भी लगता था, ऐसा ही दौर था वह जब सब लोगों की खुशी में अपनी भी खुशी दिखती थी। और कम साधनों में भी अधिक से अधिक आनंद आता था । 
  6. एक बार दूरदर्शन पर फिल्म आ गई, चला मुरारी हीरो बनने और हमने अपने सेवक मुरारी को खूब छेड़ा कि तू तो हीरो बनने जा रहा है हीरो बनने.... और वह भी खूब ही खुश हुआ, इतना खुश हुआ जैसे कि वाकई में उसी के ऊपर वह फिल्म बनी हो ।बस यही पल होते थे छोटे-छोटे, आनंद खोजने के, कम साधन में भी और अन्य को खुश करके खुशी मनाना मूल मंत्र था उन दिनों जीवन का।

Thursday, 31 January 2019

दुकानदारी(३१)

दुकानदारी (३१)
   एक बार मेहंदी और उसके भाइयों ने टॉफी बिस्किट्स  की दुकान लगाने की सोची। पड़ोस के भी 3 बच्चे तैयार हो गए बोलो उन्होंने अपने गुल्लक खोली, उसमें निकले ₹7 .75 , 25 पैसे बच गए और ₹7 50 का सामान ला कर दुकान सजा ली । उसमें थी ऑरेंज वाली कैंडी खट्टी मीठी चूसने की टोपियां लॉलीपॉप च्यूइंगम और भी इसी तरह का समान । पड़ोस के 3 बच्चे भी ले आए अपने पास इकट्ठे रूपयों का इकट्ठा रूपों का सामान। उन्होंने भी सामने ही एक कपड़ा बिछाकर दुकान से सजा ली। आमने सामने अपनी दुकानों पर तीन-तीन बच्चे बैठे हैं खुद खुद ही बैठे-बैठे बोर हो गए किसी की कोई बिक्री नहीं हो रही थी तो बीच वाले भैया को विचार आया उनके पास एक चवन्नी बची थी उसे ले जाकर पड़ोस के बच्चों से टॉफियां ले आए और खा ली। अब सामने वाले बच्चों के पास आ गईं चवन्नी उन्होंने मेहंदी  से टॉफी खरीदी और खा लीं। मेहंदी ने फिर उनसे बिस्कुट वगैरह खरीदे इस तरह से होते-होते पूरी दुकान का सामान बिक गया। और उन लोगों ने एक दूसरे का सब सामान खा लिया शाम को पापा आए मेहंदी जल्दी से भागी पापा के पास। पापा को पता था आज दुकान लगाई है उन्होंने पूछा और सुनाओ तुम्हारे समान कितना बिका ।मेहंदी बहुत खुश पापा पापा हमारा दोनों दुकानों का सामान सारा बिक गया।वह पहली बार दुकानदारी की और 100 प्रतिशत बिक्री। और बताओ कितना मुनाफा हुआ ।मेहंदी बोली ,पापा बिक्री तो बहुत हुई पर मुनाफा नहीं हुआ जो चवन्नी हमारे पास थी वहीं बच गई और इसके अलावा कुछ नहीं ।पापा ने पूरा किस्सा सुनाऔर हंसते हुए बोले तुम लोगों की बस की नहीं है दुकानदारी। दुकानदार नहीं बन सकतेतुम कभी भी। इसी के साथ उन लोगों का 1 दिन का बिजनेस समाप्त हुआ जो सिखा गया कि सबक खेल खेल में ही।

Wednesday, 9 January 2019

पहला व्रत (३०)

पहला व्रत (३०)
     महाशिवरात्रि का पर्व घर में मम्मी पापा का व्रत हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी था। इस बार बच्चों को भी चाव लगा हम भी व्रत रखेंगे, मम्मी को क्या परेशानी बिना व्रत का अलग बनाती और अब सारा खाना एक साथ ही बन जाएगा उन्होंने भी हाँ कह दी।
   स्कूल की छुट्टी थी ही सुबह सुबह उठकर सब स्नान कर मंदिर गए भगवान शिव का जलाभिषेक किया, उसके पश्चात घर आए मम्मी तो रसोई घर में व्यस्त हो गई और बच्चों को तो सताने लगी भूख ,भूल गए कि आज व्रत रखा है अलमारी में मूंगफली रखी थी, झट से निकाली और फट से खालीं।खाते-खाते याद आया अरे आज तो व्रत रखा था ये क्या हुआ  जीवन में पहली बार व्रत रखा वो भी टूट गया। बीच वाले भैया शरारती थे उन्होंने कहा अब तो व्रत टूट ही गया है तो क्यों ना ऐसा करें बिस्कुट खा लेते हैं और उन्होंने बिस्किट्स का पैकेट खोला। तीनों ने खा लिया लेकिन मन बड़ा गुमसुम था कि पहली बार रखा व्रत टूट गया ।तभी पापा भी  घर आ गए उनको देखकर मेहंदी झट गयी उनके पास। पापा पापा मेरा व्रत टूट गया। ओह्ह कैसे? डॉ साहब ने पूछा।मूंगफली मुँह लटकाये मेहंदी ने कहा। अरे बिटिया मूंगफली तो व्रत में खा सकते हैं तुम्हारा व्रत नहीं टूटा। मेहंदी चहक उठी अच्छा पापा बिस्किट्स खाने से?
    बिस्किट नहीं खाते हैं व्रत में ।
  अब तो मेहंदी को इतना दुःख हुआ जितना मूँगफली खाने से व्रत टूटने का सोच कर भी नहीं हुआ था। गुस्सा भी आया बीच वाले भैया पर उनके कारण ही.....गुरर्र।
     शाम को एक अंकल आये उन्हें पूरा किस्सा पता लगा तो उन्होंने बताया जब वो बचपन मे व्रत रखने की जिद करते थे तो उनकी मम्मी एक दाढ़ का व्रत रखने को कहती थीं वो एक तरफ के दांतों से पूरा खाना खा लेते थे। मेहंदी तुमने एक तरफ से ही तो बिस्किट खाये होंगें। मेहंदी को इतना ध्यान नहीं था उसका व्रत ना रख पाने का संताप जन्माष्टमी का व्रत रखने के पश्चात ही दूर हुआ। उसके बाद मेहंदी ध्यानपूर्वक जन्माष्टमी व शिवरात्रि के व्रत सालोंसाल रखती रही।

Sunday, 16 December 2018

जब मेहंदी ने पैसे बोये (२९)

   मेहंदी के  पास  इकट्ठी हो गई थीं चंद चवन्नी उसने बड़े भैया से पूछा इनका क्या किया जाए इत्तेफाकन उसी दिन  सुबह डॉक्टर साहब ने क्यारी में डाले थे पपीते के बीज बस बड़े भैया को झट एक विचार आया उन्होंने मेहंदी से कहा इन्हें भूमि में बोते हैं और फिर उनका पेड़ निकलेगा जिस पर आएंगी बहुत सारी चवन्नी । फिर हम उनके पैसे तोड़कर खूब सारी चीजें खरीद सकते हैं मासूम मेहंदी झट से उनकी बातों में आ गयी और क्यारी में  बो दी अपनी जमापूंजी ।भैया ने समझाया रोज इसमें ध्यान से पानी डालना तो यह हो जाएंगे पौधे जल्दी-जल्दी बड़े। मेहंदी नित्य पानी डालने लगी और जल्दी निकल आए छोटे-छोटे हरे हरे पौधे जो बढ़ने लगे दिन दूनी रात चौगुनी तेजी से।मेहंदी देख देख कर फूली ना समाती उस पर आने लगे छोटे-छोटे पपीते ,मेहंदी ने भैया से कहा इस पर चवन्नी नहीं यह क्या लगा। भैया बोले यह फल है जब बड़े हो जाएंगे और हम इन को काटेंगे तब इनके अंदर से बीजों की तरह निकलेंगी चवन्नियां। मेहंदी बड़ी खुश और भी ध्यान से पौधों की देखभाल करने लगी धीरे-धीरे पपीते हो गए बड़े अब मेहंदी को लगा यह तो पपीते हैं उसने भैया से कहा ये तो पपीते हैं, भैया बोले चवन्नी के फल भी पपीते जैसे होते हैं पकने का इंतजार तो कर ।इस बार पूछा पापा से उन्होंने  बता दिया यह पपीते हैं जब पक जायेंगे तब मिलकर खाएंगे। मेहंदी गुस्से में गई बड़े भैया के पास और पूछा भैया अभी आप ने मुझे बेबकूफ़ बनाया यह पपीते नहीं हैं  कि पापा से पूछ लिया है ।मेरी चवन्नी ढूंढो। भैया हँसने लगे बोले उनकी तो मैंने उसी दिन जमीन से निकालकर टॉफी खा ली थीं खेल खत्म पैसा हजम। मेहंदी अपनी मूर्खता पर रोती बिसूरती रह गयी ।

टिप्पणी : कितने सपने कैद रहते थे उन छोटी सी चवन्नियों में, सारा जहां खरीदने की ताकत लगती थी उनमें । एक दिन ऐसा आया सारे सपने ताकत खत्म तथा लुप्त हो गयी चवन्नी।

Wednesday, 28 November 2018

वो नेट की फ्राक (२८)

                      वो नेट की फ्रॉक (२८)
   डॉक्टर साहब ने एक बहुत सुंदर पीच रंग की फ्रॉक जिसमें खूब सारी फ्रिल थी मेहंदी को दिलवाई ,मेहंदी जिस भी उत्सव में उसे पहन कर जाती है सब उसकी बहुत तारीफ करते हैं बिल्कुल परी लग रही हो। मेहंदी को भी वह फ्रॉक बहुत भाती, सबसे बड़ी बात उस फ्रॉक में चार जेबें लगी हुई थी लड़कियों को जेब वाले कपड़े कभी कभी ही पहनने  को मिलते हैं जब भी मिलते हैं वह खूब इतराती हैं।
        समय के साथ साथ वह फ्रॉक मेहंदी को छोटी होने लगी और मम्मी ने उसे घर में पहनाने लगी मेहंदी को वह फ्रॉक जब घर में पहनने को मिलने लगी तो उसकी कदर खत्म हो गई ।   अब उसके और नए नए कपड़े आ गए थे मेहंदी का मन उन्हें पहनने को करता था इस फ्रॉक से पीछा छुड़ाना चाहती थी किंतु मम्मी कहती थी इतनी कीमती फ्रॉक है थोड़ी दिन और पहनकर कर वसूल कर लो एक बार आसपास के बच्चों और मेहंदी के भाई बहनों ने मिल के जेल परिसर में लगे जामुन के पेड़ से जामुन तोड़ने का प्लान बनाया सब बच्चों ने खूब जामुन तोड़े जिसने भर सकते थे अपनी अपनी जेब में भरे मेहंदी ने भी फ्रॉक की जेबों में और उसके बाद भी जो जामुन बचे, उसे उन्हें फ्रॉक के घेरे में भर लिए पूरे फ्रॉक पर जामुन के रस के धब्बे पड़ गए । मेहंदी खुशी खुशी घर आई देखो मम्मी कितने सारे जामुन लायी हूं। मम्मी  का तो पारा चढ़ गया सारी फ्रॉक दाग़दार कर ली अब कैसे छूटेंगे जामुन के दाग आसानी से नहीं जाते पूरी पोशाक का सत्यानाश कर लिया ।मम्मी की डांट से रूआंसी होने के बाबजूद भी मेहंदी ने सोचा चलो अब फ्रॉक से छुटकारा मिला।अनजाने में ही सही चोखा काम हो गया ,दाग अच्छे हैं, उस दिन के बाद मेहंदी ने वो फ्रॉक कभी नहीं देखी। लेकिन कुछ समय पश्चात जब कभी मेहंदी को मूँगफली रखनी होती या बाजार से टॉफी वगैरा लानी होती तो उसे जेब की कमी महसूस होने लगी और उसे याद आती अपनी पीच फ्रॉक, अब मेहंदी अक्सर अब मेहंदी अक्सर अपनी उस फ्रॉक को याद करती , लेकिन एक बार बेकार होने के बाद पुनः वह फ्रॉक नहीं मिल सकती थी ।इन्सान की फितरत  ऐसी ही है जब तक कोई चीज उसे नहीं मिलती तब तक उसे आकर्षित करती है उसे रिझाती है जब उसे वो चीज मिल जाती है तब कुछ समय तक उसको बहुत ही ध्यान पूर्वक रखता है परन्तु आसानी से उपलब्ध होने पर वो उसकी कदर करना भूल जाता है ।और फिर जब उससे उसका बिछोह होता है तब उसे फिर से उसकी कदर होने लगती है और वह उसे याद करने लगता है ।मनुष्य के संग ऐसा क्यों होता है जब कोई चीज हमारे पास होती है तब हम उसकी कदर क्यों नहीं कर पाते? उसकी कदर तभी क्यों होती है जब वह हमसे दूर होती है ?क्यों? आखिर क्यों?

Monday, 22 October 2018

जड़ों से पुनः जुड़ना(२७)

जड़ों से पुनः जुड़ना(२८)
    डॉ साहब का  अपने गृह जनपद  में स्थानांतरण हो गया ।पुनः अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां जेल परिसर में मिला खूब बड़ा सा मकान उनका निवास बना उस मकान के चारों और खूब सारी खुली जमीन थी खूब चौड़ी चौड़ी दीवारें थी जिस पर सब बच्चे पैरों पैरों भी चल लेते थे । किराये के घर में रह कर आने के बाद बड़े से सरकारी मकान में रहना सबको बहुत सुखद लग रहा था। मकान के पास खाली  जमीन में उगाये भांति भांति के फूल और सब्जियां ।टमाटर, कद्दू ,लौकी, तुरई, प्याज व करेला भिन्न-भिन्न तरह की सब्जियां उगाई गई इसके अलावा सर्दियों के मौसम में पालक मेथी हरा धनिया प्रचुर मात्रा में उगाया गया। रोज मम्मी खूब सारे अंडे उबाल कर रख देती मेहंदी खेलते खेलते मम्मी के पास आकर कहती मम्मी एक आलू दे दो और मम्मी एक उबला हुआ अंडा दे देतीं मेहंदी उसका पीला भाग खाती थी और सफेद हिस्सा कौवे को खाने के लिए फेंक देती। मेहंदी का छोटा भाई भी अब अपने पैरों पर धीरे धीरे चलने लगा था ,कभी कभी वह दूध पीने में आनाकानी करता था तो वह तीनों भाई बहन उसे घेरकर खड़े हो जाते और उसके मुंह में शीशी लगाकर फिल्मी गाने गाना शुरू कर देते थे और फिल्मी गानों की तर्ज वह जल्दी जल्दी जल्दी मुँह चला कर सारी शीशी खाली कर देता था अपना यह छोटा सा प्रयास भाई बहनों को बड़ी खुशी देता था ।तरह तरह की शरारतें करते हुए उनका बचपन अत्यंत सुखद और आराम से गुजरने लगा कई बार तीनों बच्चे पापा के साथ जेल के अंदर कैदियों को देखने भी गए वहां बड़े-बड़े खूंखार कैदी थे।
      उनकी लाल लाल आंखें देखकर मेहंदी को तो डर भी लगने लगा लेकिन कुछ कैदी बिल्कुल ही सामान्य इंसानों की तरह थे। उनको खाना बनाने का काम सौंपा गया था, मेहंदी ने देखा एक जगह खूब सारी रोटियां एक साथ बनते हुए खूब बड़ी सी जगह पर आटा बेला जाता था और उसे गोल-गोल काट लिया जाता था फिर सेकते थे। खाने के लिए कैदियों की लाइन लगती थी।उनके द्वारा कई अन्य  तरह के कार्य यथा खेतीबाड़ी आदि भी कराये जाते ।बड़े चाव से ये सब देखते हुये जीवन में आने वाली परिस्थितियों के बारे में काफी कुछ सीखने और जानने को मिला अपने गृह जनपद में अपने दादा दादी का घर और चाचा चाची से मिलना रिश्तो से जुड़ा गया।
     कुछ कैदी डॉ साहब के घर के पास की जमीन की निराई गुड़ाई करने भी आ जाते थे तथा मम्मी के द्वारा बनी चाय पीकर ही जाते थे। जेल का सायरन बजने पर सिपाही उन्हें चलने के लिए कहता था तो वह डॉक्टर साहिबा के हाथ की चाय पिए बिना जाने को तैयार ही नहीं होते थे,कहते थे तुम तो गुड़ की चाय पिलाओगे यहाँ चीनी की चाय मिलती है ।
    मम्मी भी उनसे खूब बातें कर लेती थी। एक बार एक कैदी से उन्होंने पूछा तुम सजा मिलने से पहले क्या काम करते थे कैदी बोला मैं बाल काटता था तो मम्मी बोली कि अच्छा पहले सर की घास काटते थे अब जमीन की घास काट रहे हो। इसी तरह के हास परिहास के मध्य खूब खुशी खुशी उनके काम करते थे ।
    मेहंदी को आश्चर्य भी होता था कि मम्मी इतनी सहजता से इन अपराधी लोगों से कैसे बात कर पाती हैं पर गांधी जी ने कहा है "घृणा पाप से करो पापी से नहीं " मेहंदी की मम्मी इस बात का बखूबी ध्यान रखती थीं।

Tuesday, 25 September 2018

नादान मोनू(२६)

नादान मोनू(२६)
 सांप्रदायिक दंगे किसी देश की संपत्ति सुख-शांति प्रगति को तो भंग करते ही हैं अपितु उस देश के जनों की भावनाओं को भी कई तरीके से परिवर्तित कर देते हैं ।जो दंगों की विभीषिका में जलता है वहीं इस दर्द को समझ सकता है। इसी तरह के परिवारों में एक परिवार था मेहंदी की दूर के रिश्ते की मौसी का ।उनके पति को दंगाइयों ने खत्म कर दिया था ऐसा भी अनुमान से ही कहा जा सकता है क्योंकि जब शहर में दंगे भड़क रहे थे तब वे अपने काम से वापस आ रहे थे और कभी भी अपने घर लौट कर नहीं आ पाए हमेशा के लिए लापता हो गए ना ही उनका शव मिला ना ही उनका कोई समाचार केवल एक अनुमान ही जीवन पर्यंत लगाया जाता रहा कि दंगाइयों  द्वारा उनको समाप्त कर दिया गया होगा । एक औरत की दशा का अनुमान  कीजिए जो ना सधवा रही ना विधवा । बिना पति के अपने बच्चों को संभालना,उनका पालन  पोषण एक घरेलू भारतीय  महिलाा के लिए  बहुत ही दुष्कर कार्य था। किंतु जब सर पर कोई विपदा आ पड़ती है तो उसे सहने की शक्ति भी ईश्वर प्रदान करते हैं। रिश्ते नातों की परख भी ऐसे प्रतिकूल समय में ही होती  है।
      मौसी के दुख से सभी द्रवित थे और जितना भी बन पड़ता था उनकी सहायता करने के लिए तत्पर रहते थे। मेहंदी की मम्मी भी जब अपने मायके गई तब अपनी बहन और उनकी बच्चों की सहायतार्थ कुछ सामान लेकर उनसे मिलने गयी, यह मेहंदी की मम्मी का बड़प्पन ही था कि वह कभी यह नहीं जतलाती थी कि हम तुम्हारी सहायता के लिए सामान लाए हैं अपितु वह एक बड़ी बहन द्वारा जिस तरह मिलने पर कुछ भी भेंंट इत्यादि लेकर जाते हैं उसी रूप में सब चीज लेकर जाती थीं। फल ,मिठाई वस्त्र इत्यादि जो कुछ संभव होता था प्रदान कर आर्थिक भरपाई करने का प्रयास उनके सम्मान को ठेस पहुंचाए बिना करतीं।
    दोनों बहनें अपना सुख-दुख बाटनें  में व्यस्त हो गयीं और सभी बच्चे छत पर खेलने में। छत पर खेलते खेलते अचानक  ही मोनू  रुक गया और एकटक मेहंदी को देखता रहा देखता रहा देखता ही रहा। मेहंदी बहुत छोटी थी पर फिर भी वह सोच रही थी कि मुझे क्यों ऐसे देखे जा रहा है। वह लोग कोई पकड़म पकड़ाई जैसा खेल खेल रहे थे और अचानक ही मोनू नीचे अपनी मम्मी के पास चला गया। सब बच्चे आपस में फिर खेलने में व्यस्त हो गए थोड़ी देर बाद सब बच्चों को नाश्ता करने के लिए नीचे से पुकारा गया वहां जाने पर मोनू की मम्मी ने हंसते हुए बताया कि हमारा मोनू तो कह रहा है वह बड़े होकर मेहंदी से शादी करेगा । मेहंदी लजा गयी  शायद लड़कियां  बचपन से ही समझने लगती है कि  शादी विवाह जैसी बातों पर शर्माना चाहिए । खैर बचपन की मासूमियत समझ बात आई गई हो गई ,लेकिन तब से जब भी किसी को मौका मिलता वह मेहंदी को चिढ़ाने का मौका नहीं छोड़ता। बड़े होने के बाद मेहंदी  की शादी हो गई और मोनू की भी। लेकिन किसी विवाह उत्सव या अन्य पारिवारिक समारोह में मोनू मिलता तो एक बार मेहंदी से जरूर पूछता था 'तुम कैसी हो "और मेहंदी हंस करके देती "अच्छी हूं ,और तुम बताओ भाभी जी कैसी हैं ?"मोनू भी हंसकर कह देता " अच्छी है 'लेकिन उसकी आंखों का खालीपन मेहंदी कभी समझ ही नहीं पाती थी बहुत बाद में मेहंदी को यह एहसास हुआ कि एक बार केवल एक बार अगर वह भी कह देती कि तुम कैसे हो तो शायद मोनू की आंखों का वो खालीपन भर जाता ।एक बार मेहंदी ने निश्चय किया, इस बार उससे मिलने पर वह जरुर पूछेगी कि तुम कैसे हो पर नियति का परिहास ही जानिये उस  दिन के बाद किसी समारोह में मोनू  मेहंदी से मिला ही नहीं और मेहंदी टकटकी लगाए हर समारोह में सोचती है कि शायद वो आएगा और वो पूछेगी तुम कैसे हो ,और भर देगी उसके मन का वह खाली कोना जिसमें बचपन से केवल उसी के लिए जगह रिक्त है। कच्ची उम्र का आकर्षण कभी-कभी शायद बड़े होने तक जीवित रहता है जिसे बचपना समझ कर भूल जाते हैं किंतु एक स्थान रिक्त रहता है जीवन पर्यंत ही ........

Tuesday, 18 September 2018

तीर्थयात्रा(२५)

                                  तीर्थ यात्रा
   प्रत्येक भारतीय का सपना होता है कि वह गंगोत्री यमुनोत्री बद्रीनाथ केदारनाथ इन चार धामों की यात्रा अपने जीवन काल में करे,मेहंदी के नाना जी भी तीर्थाटन के लिए अपनी पत्नी के साथ प्रस्थान को तैयार हुए।अपने व्यवसायिक कार्यों को अपने पुत्रों को सौंपकर कुछ समय अपने लिए भी निकालना उन्होंने उचित समझा प्राचीन समय में तीर्थ यात्रा करना अत्यंत कठिन होता था उस समय ना तो इतने अधिक उन्नत यातायात के साधन थे ।ना ही इतने अच्छे सड़क मार्ग और रेल मार्ग थे। इसलिए उस समय तीर्थ यात्रा करना बड़ा ही दुष्कर कार्य माना जाता था। कभी-कभी तो ऐसा भी होता था कि व्यक्ति तीर्थ यात्रा करने गया और पुनः लौट कर ही ना आया। हालांकि बाद में बहुत अच्छे रेल के और यातायात के साधन विकसित हो गए जिसके कारण तीर्थ यात्रा करना अत्यंत सुगम हो गया ।किंतु फिर भी सबके हृदय में एक आशंका तो रहती थी कि पता नहीं हम तीर्थ यात्रा से वापस आ पाएंगे या नहीं इसलिए जाने से पहले समस्त परिवार एकत्रित होता था,तथा एक फोटो ग्राफ खींचकर उसे यादगार के रूप में लिया जाता था।मेहंदी के नानाजी जब तीर्थ यात्रा के लिए जाने लगे उन्होंने भी अपने समस्त पुत्र-पुत्रियों के साथ एक फोटोग्राफ खिंचवाया। मेहंदी भी अपने मम्मी पापा के साथ नाना नानी के घर उनकी तीर्थ यात्रा के उपलक्ष्य में गई समस्त परिवार का एक साथ फोटो खिंचवाना अत्यंत ही आनंदित अवसर था किंतु मन ही मन में आशंका भी थी।मेहंदी तो उस समय मात्र 5 वर्ष की बालिका की थी यह सब बातें तो उसे बड़े होने पर ज्ञात हुईं। वयस्क होने पर एक दिन उसे लाला जी की डायरी मिल गयी जिसके ऊपर शीर्षक था," तीर्थ यात्रा का वर्णन" मेहंदी की तो बाँछे खिल गयीं। उसने सोचा उसकी तो घर बैठे ही तीर्थयात्रा हो जाएगी तथा लालाजी ने किस तरीके से तीर्थ यात्रा का आनंद लिया उसकी आंखों के आगे वह सारे दृश्य भी साकार हो जाएंगे। मेहंदी ने बड़े चाव से वो डायरी खोली किंतु यह क्या वह पूरी डायरी तो उर्दू में लिखी हुई थी जी हां उस काल में व्यापारी लोग मुख्य जबान के रुप में या लिखित रूप में उर्दू का ही प्रयोग करते थे हिंदी और अंग्रेजी का प्रयोग तो बहुत बाद में शुरू हुआ।मेहंदी के लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर हो गया क्योंकि उसे उर्दू पढ़नी बिल्कुल नहीं आती थी उर्दू जबान समझने में शेर शायरी तो अच्छी लगती है काफी हदतक समझ भी आ जाती है, पढ़ने में बिल्कुल भिन्न है। उस समय लोगों की मुख्य भाषा उर्दू थी अतः उसी काल में यह कहावत बनी होगी" हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फारसी क्या "इन पंक्तियों के द्वारा उस समय के साक्षर व्यक्तियों की भाषा का महत्व ज्ञात होता है।

Thursday, 30 August 2018

यादों के झरोखों में पहला विवाह उत्सव (२४)

यादों के झरोखों में पहला विवाह उत्सव (२४)
   भारत में शादियां व्यक्ति के संग ही उसके पूरे समाज के लिए भी अत्यधिक हर्षोउल्लास का विषय होता है, आखिरकार जीवन मे एक ही बार शादी होती है (अमूमन)तब तो धूमधाम भी मचनी ही चाहिये और जब आर्थिक स्थिति मजबूत हो तब तो भारतीय शादियों के कहने ही क्या!
   मेहंदी ने होश सम्भालने के बाद पहली बार इतनी भीड़ भाड़ ,तड़क भड़क, शोर शराबा, तैयारियाँ देखी थीं। वो भी अपने मामा की शादी में जाने के लिए उत्साहित थी। फ्रॉक या स्कर्ट पहनने वाली मेहंदी के लिए उसकी मामी (जिनकी शादी थी उनकी भाभी) ने हल्के हरे रंग का कुर्ता और काली सलवार व काले दुपट्टे का परिधान स्वयं ही सिला था जिसे पहन वो फूली ना समा रही थी।उसके रिश्ते के भाई बहन उसे चिढ़ाने लगे पंजाबन पंजाबन ,पर वो नई तरह के परिधान पहन कर ही मुग्ध थी। उस दिन मानव मन की ये गुत्थी भी समझ आई कि किसी को चिढ़ाने में आनन्द भी तभी तक आता है जब तक वो चिढ़ता है, जहाँ कोई असर नहीं होता वहाँ से ध्यान हट जाता है। अब बच्चा पार्टी का ध्यान आकर्षित हुआ घोड़ी पर।
   सबने जिद पकड़ ली हम भी मामा/ चाचा के संग घोड़ी पर बैठेंगें । घोड़ी एक बच्चों की संख्या भरपूर ,नानाजी (जिन्हें सब लालाजी कहते थे) ने समस्या का समाधान किया कि दो घोड़ी मंगवाई जायेंगी । दो घोड़ी आयी, बड़े भैया बने सहबाला (घुड़चढ़ी की परंपरा शादी में सबसे रोमांचक रस्म होती है। इसमें पहले दूल्हे को घर के बड़े तिलक कर अपना आशीर्वाद देते हैं। भाभियां काजल लगाकर नजर न लगने की कामना करती हैं। घोड़ी को चने की दाल खिलाकर घोड़ीवाले को नेग दिया जाता है। लगाम पकड़ने पर फूफा और दामादों को दूल्हे के पिता नेग देते हैं। घुड़चढ़ी के समय ढोल-ताशे बजते हैं। दूल्हे संग सहबाला बैठाया जाता है। अग्रवाल समाज में छतर की परंपरा भी रही है। इसमें कोई चांदी का तो कई चांदी के तारों का छतर इस्तेमाल करता है। घुड़चढ़ी के बाद बहनें या बुआ दूल्हे की आरती उतारती हैं और बहनोई सेहरा और कमरबंध पहनाता है, जिसका उन्हें नेग दिया जाता है। मां लड्डू खिला कर विदा करती है। घुड़चढ़ी मन्दिर जाती है वहां से पूजन के पश्चात बारात रवानगी हो जाती है, घुड़चढ़ी के बाद दूल्हा दुल्हन लेकर ही पुनः घर आता है) 
     पूरी सजधन नाच गानों के साथ बारात पहुँची, सभी रस्मो के संग दुल्हन का आगमन हुआ। मेहंदी ने पहली बार किसी को दुल्हन बना देखा था वो तो अपनी मामी को देखती ही रह गयी, उसकी निगाहें टिकी ही रह गईं दुल्हन के रूप पर।विदाई के बाद सब दुल्हन संग ननिहाल वापस  आ गए वहां सभी महिलायें दुल्हन को घेर कर बैठीं थीं ,मेहंदी एकटक दुल्हन को निहार रही थी तभी किसी ने दुल्हन से कहा देखो तुम्हारी भांजी तुम्हें देखे ही जा रही है , मामी ने धीरे से मेहंदी का चेहरा थाम कर  कहा...अरे...! मेहंदी को तो जैसे सारे जहान की खुशियां मिल गयीं ....वो इतनी खुश थी जैसे किसी परिकथा की परी ने उसको स्पर्श किया हो।
   

Thursday, 12 July 2018

आशा का दीप (२३)

            आशा का दीप (२३)
   डॉ साहब अक़्सर किस्से कहानियां सुनाया करते थे, समय बिताने का ये उनका शगल था।अकबर बीरबल के मजेदार किस्से भी उनकी बातचीत में आ जाते, ऐसा ही एक किस्सा मेहंदी के मन में गहरा पैठ गया।
              "बीरबल की खिचड़ी"
   एक दफा शहंशाह अकबर ने घोषणा की कि यदि कोई व्यक्ति सर्दी के मौसम में नर्मदा नदी के ठंडे पानी में घुटनों तक डूबा रह कर सारी रात गुजार देगा उसे भारी भरकम तोहफ़े से पुरस्कृत किया जाएगा।
         
एक गरीब धोबी ने अपनी गरीबी दूर करने की खातिर हिम्मत की और सारी रात नदी में घुटने पानी में ठिठुरते बिताई और जहाँपनाह से अपना ईनाम लेने पहुँचा।
बादशाह अकबर ने उससे पूछा, “तुम कैसे सारी रात बिना सोए, खड़े-खड़े ही नदी में रात बिताए? तुम्हारे पास क्या सबूत है?”
धोबी ने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, मैं सारी रात नदी छोर के महल के कमरे में जल रहे दीपक को देखता रहा और इस तरह जागते हुए सारी रात नदी के शीतल जल में गुजारी।“
बादशाह ने क्रोधित होकर कहा, “तो इसका मतलब यह हुआ कि तुम महल के दिए की गरमी लेकर सारी रात पानी में खड़े रहे और ईनाम चाहते हो। सिपाहियों इसे जेल में बन्द कर दो”
बीरबल भी दरबार में था। उसे यह देख बुरा लगा कि बादशाह नाहक ही उस गरीब पर जुल्म कर रहे हैं। बीरबल दूसरे दिन दरबार में हाज़िर नहीं हुआ, जबकि उस दिन दरबार की एक आवश्यक बैठक थी। बादशाह ने एक खादिम को बीरबल को बुलाने भेजा। खादिम ने लौटकर जवाब दिया, बीरबल खिचड़ी पका रहे हैं और वह खिचड़ी पकते ही उसे खाकर आएँगे।
जब बीरबल बहुत देर बाद भी नहीं आए तो बादशाह को बीरबल की चाल में कुछ सन्देह नजर आया। वे खुद तफ़तीश करने पहुँचे। बादशाह ने देखा कि एक बहुत लंबे से डंडे पर एक घड़ा बाँध कर उसे बहुत ऊँचा लटका दिया गया है और नीचे जरा सा आग जल रहा है। पास में बीरबल आराम से खटिए पर लेटे हुए हैं।
बादशाह ने तमककर पूछा, “यह क्या तमाशा है? क्या ऐसी भी खिचड़ी पकती है?”
बीरबल ने कहा, “ माफ करें, जहाँपनाह, जरूर पकेगी। वैसी ही पकेगी जैसी कि धोबी को महल के दिये की गरमी मिली थी”
बादशाह को बात समझ में आ गई। उन्होंने बीरबल को गले लगाया और धोबी को रिहा करने और उसे ईनाम देने का हुक्म दिया।

        कभी कभी व्यक्ति जब उदासियों की ठंडक में कांप रहा होता है तो दूर टिमटिमाता दिया भी रात व्यतीत करने का साधन बन जाता है वो दिया जिसे पता नहीं किसने महल की प्राचीर पर रखा होगा,जिस दिये को ना वो जला सकता है ना बुझा सकता है किन्तु वो संबल बन जाता है दूर शीतल जल में खड़े व्यक्ति का।
   वो दिया जिस पर उसका कोई हक़ नही जिसे वो सिर्फ़ देख सकता है,ना छू सकता है ना पा सकता है।
  जिस तरह उस धोबी पर इल्जाम लगे कि उसने दिये की गर्माहट में रात गुजार दी उसी तरह आशा के दीप के लिए भी कई इल्जाम ये समाज लगा कर व्यक्ति को उसके हक़ से वंचित कर सकता है एवं सबके जीवन में कोई बीरबल आकर समस्या का समाधान करे ये सम्भव नहीं ।अतः वो छुपाता रहता है अपने अन्तर्मन में उस दिये की गर्माहट को .....क्योंकि जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिये किसी तरह बितानी तो है ही ये सर्द रात्रि शीतल नदी के जल में खड़े खड़े ही।

Monday, 9 July 2018

छाला (२२)

   छाला (२२)
    घरेलू नौकर के ना आने पर एक दिन मम्मी ने मेहंदी से आधी बाल्टी पानी हैण्डपम्प से भरने को कह दिया।काफी बड़ी बाल्टी थी मेहंदी को पहली बार इतनी मेहनत का काम मिला था तो उसने जोश जोश में पूरी बाल्टी भर दी....पर ये क्या उसका हाथ सूज कर फूला फूला क्यों हो गया।दर्द भरे हाथ लेकर मम्मी के पास भागी ,मम्मी इतना बड़ा छाला देख घबरा गयीं अब तो डॉ साहब से डाँट पड़नी पक्की है कि मेरी लाडली से इतना काम क्यों करवाया।उन्होंने पूरी भरी बाल्टी देखी और मेहंदी पर चिल्लाने लगीं तुझे आधी बाल्टी कही थी पूरी क्यों भरी। मेहंदी सहम कर नन्हे भाई के पास बैठ गयी तभी वहां बड़े भैया आ गये और उसके हाथ के छाले को स्नेह से सहलाते हुए उस पर मरहम लगाया और छोटे भाई के नर्म नाजुक गुलाबी तलवे दिखा कर बोले तू भी इसकी तरह सारे दिन बैठी रहा कर इसके जैसी ही नाजुक नर्म रहना।मेहंदी की समझ में भैया की बातें आयीं या नहीं पता नहीं पर मरहम से ठंडक मिली किन्तु वो सोच रही थी जैसे भैया उसे प्यार करते हैं माँ क्यों नहीं करतीं हमेशा मेहंदी में उन्हें कमियाँ ही क्यों दिखती हैं .....कुछ करो तो भी ना करो तो भी.....
   काश भैया की तरह माँ ने भी उसकी चोट सहला दी होती। ये छाला तो कुछ दिन में ठीक हो जायेगा किन्तु जो छाले मम्मी के व्यवहार से मन में उभर गये हैं वो क्या कभी भी भर पायेंगे?

Tuesday, 26 June 2018

नन्हें मेहमान का आगमन(२१)

नन्हें मेहमान का आगमन(२१)
उफ्फ भीषण गर्मी हो रही है, उस समय कूलर भी मुश्किल से दिखते थे ac तो शायद  कुछ लोग ही जानते होंगे या वो भी नही,सीलिंग फैन के सहारे ही गर्मियां कटती थीं।अगर विधुत ना हो तो सब व्यर्थ।कस्बे में बिजली भी तो आँख मिचौली खेलती रहती थी।दोपहर को ओढ़ने की चादर गीली कर ओढ़ लेते थे जो चंद मिनटों में ही सूख जाती थी फिर गीली करके ओढ़ते,इसी कवायद में दोपहर कट जाती जब बिजली आती तो राहत लाती।मेहंदी सोचती कोई ऐसी मशीन होनी चाहिये जिसमें बिजली आने पर भर लो और जब बिजली चली जाए तब इस्तेमाल कर लो।वर्षों बाद ये आस पूरी हुई इन्वर्टर के रूप में, धन्य है वो जिसने पहले ac से dc में फिर dc से ac में बिजली को बदला ।उसे शत शत नमन।
    मम्मी का पेट इतना फूलता क्यों जा रहा है, क्या हुआ है मम्मी को? मम्मी फ़्रिज से बर्फ़ की एक ट्रे निकालतीं जब तक सब भाई बहन एक टुकड़ा भी नही खा पाते थे तब तक वो पूरी ट्रे की बर्फ़ खा लेती थीं।मेहंदी को अचरज होता मम्मी को क्या होता जा रहा है।
  तब उसे पता लगा कि एक छोटा भाई या बहन आने वाला है अब तो मेहंदी को मम्मी का पेट छूने में बड़ा मजा आता।नन्हा सा भैया आने वाला है उसके साथ ख़ूब खेलूंगी।कोई चिढ़ा देता बहन आएगी तो वो वाकई में चिढ़ जाती नही भैया है और मम्मी का पेट छू कहती शूज़ पहना है भैया ही है।
   और फ़िर एक सुबह नन्हा मुन्ना भाई आया जो मेहंदी की आँख का तारा और खिलौना बन गया।

Friday, 22 June 2018

रैबीज की विभीषिका(२०)

रैबीज की विभीषिका(२०)
  मेहंदी एक दिन विद्यालय से आयी तो मम्मी की आँखों से झर झर आँसू बह रहे थे,पापा बहुत तसल्ली से कह रहे थे शशि हिम्मत रखो तैयार हो जाओ।मम्मी ने हरी काइया साड़ी पहनी जिस पर सफेद फूलों की कढ़ाई थी ये साड़ी मेहंदी को बहुत पसंद थी लेकिन इस के साथ मम्मी का रोता मुखड़ा बिलकुल सही नहीं लग रहा था।पहली बार मेहंदी ने मम्मी को रोते हुये देखा था,बड़ा विचित्र लग रहा था अपनी हंसमुख मम्मी को रोते हुये देखना।मम्मी पापा ने सभी बच्चों को भी तैयार कर दिया,मेहंदी की समझ में ही नहीं आ रहा कि रोते हुए कहाँ जाने का कार्यक्रम है।बड़े भैया ने उसे बताया कक्कू मामा नहीं रहे। नहीं रहे अर्थात? मर गये- कैसे? कुत्ते के काटने से, कुत्ते के काटने से भी कोई मरता है क्या भला? कई सवालों के ज़बाब तो वक्त के प्रवाह संग बाद में मिले।कक्कू मामा पालतू गाय के लिये चारे पानी की व्यवस्था कर रहे थे तभी एक सड़क के कुत्ते ने आकर उन्हें काट लिया नानी ने डॉ को बुलाया, उन्होंने 14 एन्टी रैबीज इंजेक्शन लगवाने की सलाह दी।नानी कक्कू मामा को अपने साथ ले जाकर इंजेक्शन लगवाने लगीं। वो इंजेक्शन बेहद दर्दनाक होते हैं,एक या दो इंजेक्शन के बाद मामा ने कह दिया कि वो खुद जाकर इंजेक्शन लगवा लिया करेंगें नानी को परेशान होने की जरूरत नहीं है।उन्होंने इंजेक्शन का कॉर्स पूरा नहीं किया, इससे रैबीज वायरस उनके शरीर में पनपते रहे।उनके कॉलेज का टूर आगरा गया वहां रस्ते में यमुना नदी के अथाह जल को देख उन्हें दौरा पड़ गया( रैबीज में जल देख कर फिट पड़ते हैं) उनकी बुरी हालत हो गयी जीभ बाहर लटकने लगी, प्रत्यक्ष दर्शियों का कहना था कि उनकी शक्ल भी कुत्ते जैसी लगने लगी थी। आनन फानन में उन्हें अस्पताल ले जाया गया वहाँ डॉ ने उन्हें एक इंजेक्शन दिया उसके बाद वो चिरनिद्रा में लीन हो गये। कक्कू मामा सभी मामाओं में से बच्चों को बहुत प्यार करते,अपनी बाइक पर घुमाते ,77 (कोला) पिलाते तथा अन्य कई मनोरंजन करते। उनके जाने का ख़ालीपन बहुत समय तक सबको सालता रहा, शायद बहुत समय से भी अधिक किन्तु वक़्त के गुजरने के साथ  हम दुःखद स्मृतियों का जिक्र करना बंद कर देते हैं तथा उस दुःख के साथ जीना सीख जाते हैं।

Tuesday, 29 May 2018

विषधर से सामना(१९)

विषधर से सामना(१९)
   सन्ध्या समय माँ रसोई में व्यस्त,दोनों भाई पढ़ाई में,मेहंदी ने सोचा टीवी देखा जाये जैसे ही टीवी के पास गई उसके नीचे पीत मोटी रज्जु जैसा हिलता डुलता कुछ दिखा उत्सुकतावश माँ को आवाज दी देखो यहाँ क्या है, माँ और भाई भागे आये,मम्मी चिल्लाई जल्दी से बच्चों बेड पर चढ़ जाओ ये नाग है।नाग? ये जीव पहली बार देखा।मेहंदी की उत्सुकता और बढ़ गयी।माँ की आज्ञा का पालन करते हुए तीनों बेड पर चढ़ सर्प को निहारने लगे।मम्मी ने किसी को बुलाया और नाग दिखाया।उसने कहा ये तो विषैला सर्प है सपेरा बुलाना होगा वो ढूंढ कर सपेरा लाया,सब बच्चों को दूसरे कमरे में भेज कर उसने बीन बजाई,जब बच्चे बाहर आये तो सर्प बोतल में बंद था।सपेरे ने बताया ये बेहद जहरीला साँप है।यदि डस लेता तो बचना मुश्किल था।सांप व इनाम लेकर वो चला गया।जब पापा आये तो उन्होंने मेहंदी को खूब शाबाशी दी कि अनजान जीव देख उसे छुआ नहीँ वरन मम्मी को बुला लिया।फिर एक किताब में साँप के कई फोटो दिखाये और तरह तरह के सर्पों की जानकारी दी।उनके जहर व काटने से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में भी बताया।

Friday, 25 May 2018

विभिन्न पशुओं से परिचय(१८)

         विभिन्न पशुओं से परिचय(१८)
     बंदर से तो आम का धमाल हो ही चुका था।एक बार पूरा परिवार आँगन में बैठा हुआ गोलगप्पे खा रहा था,मेहँदी धीरे धीरे खा रही थी और सारा परिवार अंदर चला गया,एक बन्दर जल्दी से आया और सभी की तरह पानी में डुबो कर गोलगप्पे खाने लगा मेहंदी उसे इंसानों की तरह खाते देखती रही ना तो किसी को बन्दर भगाने बुलाया और ना ही अपने हिस्से के गोलगप्पे समाप्त होने की चिंता की।एक दिन एक लड़की घर आई उसका हाथ बुरी तरह फ्फका हुआ था पता लगा बिल्ली ने काटा था।उसे देख अजीब सी अनुभूति हुई।एक मरीज आया जिसे कुत्ते ने काट लिया था,उसको इंजेक्शन लगवाने की सलाह मिली ,14 सुई, अरे बाबा रे,मेहंदी को तो एक सुई से ही डर लगता था।उससे कड़वी गोलियां नहीं नहीं निगली जाती थीं, कभी बुख़ार आने पर जबरन खिलाईं जाने पर वो उलटी कर देती थी,तब पापा सिरींज भर लेते और ना ना करने पर भी उसे सुई लगवानी ही होती थी।वो तो पापा के प्रति उसका स्नेह होता था जो इंजेक्शन का दर्द सहन कर लेती थी क्योंकि उसके बाद डॉ साहब उसको कोई अच्छी सी चीज दिला कर उसके लाड़ भी करते थे।इसके अतिरिक्त मधुमक्खी, मक्खी,मच्छर तथा विद्यालय जाते हुए रस्ते में दिखने वाले मुर्गे,सूअर,गाय, भैंस,बकरी ,तितली तथा कई चिड़िया ,कौवे,तोते व विभिन्न पशु पक्षियों को मेहंदी पहचानने लगी थी,किसी को देख सिहर जाती थी एवं किसी को देख खुश हो जाती थी।कुल मिला कर प्रकृति की विभिन्नता से परिचय प्राप्त हो रहा था।