Thursday, 30 August 2018

यादों के झरोखों में पहला विवाह उत्सव (२४)

यादों के झरोखों में पहला विवाह उत्सव (२४)
   भारत में शादियां व्यक्ति के संग ही उसके पूरे समाज के लिए भी अत्यधिक हर्षोउल्लास का विषय होता है, आखिरकार जीवन मे एक ही बार शादी होती है (अमूमन)तब तो धूमधाम भी मचनी ही चाहिये और जब आर्थिक स्थिति मजबूत हो तब तो भारतीय शादियों के कहने ही क्या!
   मेहंदी ने होश सम्भालने के बाद पहली बार इतनी भीड़ भाड़ ,तड़क भड़क, शोर शराबा, तैयारियाँ देखी थीं। वो भी अपने मामा की शादी में जाने के लिए उत्साहित थी। फ्रॉक या स्कर्ट पहनने वाली मेहंदी के लिए उसकी मामी (जिनकी शादी थी उनकी भाभी) ने हल्के हरे रंग का कुर्ता और काली सलवार व काले दुपट्टे का परिधान स्वयं ही सिला था जिसे पहन वो फूली ना समा रही थी।उसके रिश्ते के भाई बहन उसे चिढ़ाने लगे पंजाबन पंजाबन ,पर वो नई तरह के परिधान पहन कर ही मुग्ध थी। उस दिन मानव मन की ये गुत्थी भी समझ आई कि किसी को चिढ़ाने में आनन्द भी तभी तक आता है जब तक वो चिढ़ता है, जहाँ कोई असर नहीं होता वहाँ से ध्यान हट जाता है। अब बच्चा पार्टी का ध्यान आकर्षित हुआ घोड़ी पर।
   सबने जिद पकड़ ली हम भी मामा/ चाचा के संग घोड़ी पर बैठेंगें । घोड़ी एक बच्चों की संख्या भरपूर ,नानाजी (जिन्हें सब लालाजी कहते थे) ने समस्या का समाधान किया कि दो घोड़ी मंगवाई जायेंगी । दो घोड़ी आयी, बड़े भैया बने सहबाला (घुड़चढ़ी की परंपरा शादी में सबसे रोमांचक रस्म होती है। इसमें पहले दूल्हे को घर के बड़े तिलक कर अपना आशीर्वाद देते हैं। भाभियां काजल लगाकर नजर न लगने की कामना करती हैं। घोड़ी को चने की दाल खिलाकर घोड़ीवाले को नेग दिया जाता है। लगाम पकड़ने पर फूफा और दामादों को दूल्हे के पिता नेग देते हैं। घुड़चढ़ी के समय ढोल-ताशे बजते हैं। दूल्हे संग सहबाला बैठाया जाता है। अग्रवाल समाज में छतर की परंपरा भी रही है। इसमें कोई चांदी का तो कई चांदी के तारों का छतर इस्तेमाल करता है। घुड़चढ़ी के बाद बहनें या बुआ दूल्हे की आरती उतारती हैं और बहनोई सेहरा और कमरबंध पहनाता है, जिसका उन्हें नेग दिया जाता है। मां लड्डू खिला कर विदा करती है। घुड़चढ़ी मन्दिर जाती है वहां से पूजन के पश्चात बारात रवानगी हो जाती है, घुड़चढ़ी के बाद दूल्हा दुल्हन लेकर ही पुनः घर आता है) 
     पूरी सजधन नाच गानों के साथ बारात पहुँची, सभी रस्मो के संग दुल्हन का आगमन हुआ। मेहंदी ने पहली बार किसी को दुल्हन बना देखा था वो तो अपनी मामी को देखती ही रह गयी, उसकी निगाहें टिकी ही रह गईं दुल्हन के रूप पर।विदाई के बाद सब दुल्हन संग ननिहाल वापस  आ गए वहां सभी महिलायें दुल्हन को घेर कर बैठीं थीं ,मेहंदी एकटक दुल्हन को निहार रही थी तभी किसी ने दुल्हन से कहा देखो तुम्हारी भांजी तुम्हें देखे ही जा रही है , मामी ने धीरे से मेहंदी का चेहरा थाम कर  कहा...अरे...! मेहंदी को तो जैसे सारे जहान की खुशियां मिल गयीं ....वो इतनी खुश थी जैसे किसी परिकथा की परी ने उसको स्पर्श किया हो।
   

Thursday, 12 July 2018

आशा का दीप (२३)

            आशा का दीप (२३)
   डॉ साहब अक़्सर किस्से कहानियां सुनाया करते थे, समय बिताने का ये उनका शगल था।अकबर बीरबल के मजेदार किस्से भी उनकी बातचीत में आ जाते, ऐसा ही एक किस्सा मेहंदी के मन में गहरा पैठ गया।
              "बीरबल की खिचड़ी"
   एक दफा शहंशाह अकबर ने घोषणा की कि यदि कोई व्यक्ति सर्दी के मौसम में नर्मदा नदी के ठंडे पानी में घुटनों तक डूबा रह कर सारी रात गुजार देगा उसे भारी भरकम तोहफ़े से पुरस्कृत किया जाएगा।
         
एक गरीब धोबी ने अपनी गरीबी दूर करने की खातिर हिम्मत की और सारी रात नदी में घुटने पानी में ठिठुरते बिताई और जहाँपनाह से अपना ईनाम लेने पहुँचा।
बादशाह अकबर ने उससे पूछा, “तुम कैसे सारी रात बिना सोए, खड़े-खड़े ही नदी में रात बिताए? तुम्हारे पास क्या सबूत है?”
धोबी ने उत्तर दिया, “जहाँपनाह, मैं सारी रात नदी छोर के महल के कमरे में जल रहे दीपक को देखता रहा और इस तरह जागते हुए सारी रात नदी के शीतल जल में गुजारी।“
बादशाह ने क्रोधित होकर कहा, “तो इसका मतलब यह हुआ कि तुम महल के दिए की गरमी लेकर सारी रात पानी में खड़े रहे और ईनाम चाहते हो। सिपाहियों इसे जेल में बन्द कर दो”
बीरबल भी दरबार में था। उसे यह देख बुरा लगा कि बादशाह नाहक ही उस गरीब पर जुल्म कर रहे हैं। बीरबल दूसरे दिन दरबार में हाज़िर नहीं हुआ, जबकि उस दिन दरबार की एक आवश्यक बैठक थी। बादशाह ने एक खादिम को बीरबल को बुलाने भेजा। खादिम ने लौटकर जवाब दिया, बीरबल खिचड़ी पका रहे हैं और वह खिचड़ी पकते ही उसे खाकर आएँगे।
जब बीरबल बहुत देर बाद भी नहीं आए तो बादशाह को बीरबल की चाल में कुछ सन्देह नजर आया। वे खुद तफ़तीश करने पहुँचे। बादशाह ने देखा कि एक बहुत लंबे से डंडे पर एक घड़ा बाँध कर उसे बहुत ऊँचा लटका दिया गया है और नीचे जरा सा आग जल रहा है। पास में बीरबल आराम से खटिए पर लेटे हुए हैं।
बादशाह ने तमककर पूछा, “यह क्या तमाशा है? क्या ऐसी भी खिचड़ी पकती है?”
बीरबल ने कहा, “ माफ करें, जहाँपनाह, जरूर पकेगी। वैसी ही पकेगी जैसी कि धोबी को महल के दिये की गरमी मिली थी”
बादशाह को बात समझ में आ गई। उन्होंने बीरबल को गले लगाया और धोबी को रिहा करने और उसे ईनाम देने का हुक्म दिया।

        कभी कभी व्यक्ति जब उदासियों की ठंडक में कांप रहा होता है तो दूर टिमटिमाता दिया भी रात व्यतीत करने का साधन बन जाता है वो दिया जिसे पता नहीं किसने महल की प्राचीर पर रखा होगा,जिस दिये को ना वो जला सकता है ना बुझा सकता है किन्तु वो संबल बन जाता है दूर शीतल जल में खड़े व्यक्ति का।
   वो दिया जिस पर उसका कोई हक़ नही जिसे वो सिर्फ़ देख सकता है,ना छू सकता है ना पा सकता है।
  जिस तरह उस धोबी पर इल्जाम लगे कि उसने दिये की गर्माहट में रात गुजार दी उसी तरह आशा के दीप के लिए भी कई इल्जाम ये समाज लगा कर व्यक्ति को उसके हक़ से वंचित कर सकता है एवं सबके जीवन में कोई बीरबल आकर समस्या का समाधान करे ये सम्भव नहीं ।अतः वो छुपाता रहता है अपने अन्तर्मन में उस दिये की गर्माहट को .....क्योंकि जीवन की कठिनाइयों को दूर करने के लिये किसी तरह बितानी तो है ही ये सर्द रात्रि शीतल नदी के जल में खड़े खड़े ही।

Monday, 9 July 2018

छाला (२२)

   छाला (२२)
    घरेलू नौकर के ना आने पर एक दिन मम्मी ने मेहंदी से आधी बाल्टी पानी हैण्डपम्प से भरने को कह दिया।काफी बड़ी बाल्टी थी मेहंदी को पहली बार इतनी मेहनत का काम मिला था तो उसने जोश जोश में पूरी बाल्टी भर दी....पर ये क्या उसका हाथ सूज कर फूला फूला क्यों हो गया।दर्द भरे हाथ लेकर मम्मी के पास भागी ,मम्मी इतना बड़ा छाला देख घबरा गयीं अब तो डॉ साहब से डाँट पड़नी पक्की है कि मेरी लाडली से इतना काम क्यों करवाया।उन्होंने पूरी भरी बाल्टी देखी और मेहंदी पर चिल्लाने लगीं तुझे आधी बाल्टी कही थी पूरी क्यों भरी। मेहंदी सहम कर नन्हे भाई के पास बैठ गयी तभी वहां बड़े भैया आ गये और उसके हाथ के छाले को स्नेह से सहलाते हुए उस पर मरहम लगाया और छोटे भाई के नर्म नाजुक गुलाबी तलवे दिखा कर बोले तू भी इसकी तरह सारे दिन बैठी रहा कर इसके जैसी ही नाजुक नर्म रहना।मेहंदी की समझ में भैया की बातें आयीं या नहीं पता नहीं पर मरहम से ठंडक मिली किन्तु वो सोच रही थी जैसे भैया उसे प्यार करते हैं माँ क्यों नहीं करतीं हमेशा मेहंदी में उन्हें कमियाँ ही क्यों दिखती हैं .....कुछ करो तो भी ना करो तो भी.....
   काश भैया की तरह माँ ने भी उसकी चोट सहला दी होती। ये छाला तो कुछ दिन में ठीक हो जायेगा किन्तु जो छाले मम्मी के व्यवहार से मन में उभर गये हैं वो क्या कभी भी भर पायेंगे?

Tuesday, 26 June 2018

नन्हें मेहमान का आगमन(२१)

नन्हें मेहमान का आगमन(२१)
उफ्फ भीषण गर्मी हो रही है, उस समय कूलर भी मुश्किल से दिखते थे ac तो शायद  कुछ लोग ही जानते होंगे या वो भी नही,सीलिंग फैन के सहारे ही गर्मियां कटती थीं।अगर विधुत ना हो तो सब व्यर्थ।कस्बे में बिजली भी तो आँख मिचौली खेलती रहती थी।दोपहर को ओढ़ने की चादर गीली कर ओढ़ लेते थे जो चंद मिनटों में ही सूख जाती थी फिर गीली करके ओढ़ते,इसी कवायद में दोपहर कट जाती जब बिजली आती तो राहत लाती।मेहंदी सोचती कोई ऐसी मशीन होनी चाहिये जिसमें बिजली आने पर भर लो और जब बिजली चली जाए तब इस्तेमाल कर लो।वर्षों बाद ये आस पूरी हुई इन्वर्टर के रूप में, धन्य है वो जिसने पहले ac से dc में फिर dc से ac में बिजली को बदला ।उसे शत शत नमन।
    मम्मी का पेट इतना फूलता क्यों जा रहा है, क्या हुआ है मम्मी को? मम्मी फ़्रिज से बर्फ़ की एक ट्रे निकालतीं जब तक सब भाई बहन एक टुकड़ा भी नही खा पाते थे तब तक वो पूरी ट्रे की बर्फ़ खा लेती थीं।मेहंदी को अचरज होता मम्मी को क्या होता जा रहा है।
  तब उसे पता लगा कि एक छोटा भाई या बहन आने वाला है अब तो मेहंदी को मम्मी का पेट छूने में बड़ा मजा आता।नन्हा सा भैया आने वाला है उसके साथ ख़ूब खेलूंगी।कोई चिढ़ा देता बहन आएगी तो वो वाकई में चिढ़ जाती नही भैया है और मम्मी का पेट छू कहती शूज़ पहना है भैया ही है।
   और फ़िर एक सुबह नन्हा मुन्ना भाई आया जो मेहंदी की आँख का तारा और खिलौना बन गया।

Friday, 22 June 2018

रैबीज की विभीषिका(२०)

रैबीज की विभीषिका(२०)
  मेहंदी एक दिन विद्यालय से आयी तो मम्मी की आँखों से झर झर आँसू बह रहे थे,पापा बहुत तसल्ली से कह रहे थे शशि हिम्मत रखो तैयार हो जाओ।मम्मी ने हरी काइया साड़ी पहनी जिस पर सफेद फूलों की कढ़ाई थी ये साड़ी मेहंदी को बहुत पसंद थी लेकिन इस के साथ मम्मी का रोता मुखड़ा बिलकुल सही नहीं लग रहा था।पहली बार मेहंदी ने मम्मी को रोते हुये देखा था,बड़ा विचित्र लग रहा था अपनी हंसमुख मम्मी को रोते हुये देखना।मम्मी पापा ने सभी बच्चों को भी तैयार कर दिया,मेहंदी की समझ में ही नहीं आ रहा कि रोते हुए कहाँ जाने का कार्यक्रम है।बड़े भैया ने उसे बताया कक्कू मामा नहीं रहे। नहीं रहे अर्थात? मर गये- कैसे? कुत्ते के काटने से, कुत्ते के काटने से भी कोई मरता है क्या भला? कई सवालों के ज़बाब तो वक्त के प्रवाह संग बाद में मिले।कक्कू मामा पालतू गाय के लिये चारे पानी की व्यवस्था कर रहे थे तभी एक सड़क के कुत्ते ने आकर उन्हें काट लिया नानी ने डॉ को बुलाया, उन्होंने 14 एन्टी रैबीज इंजेक्शन लगवाने की सलाह दी।नानी कक्कू मामा को अपने साथ ले जाकर इंजेक्शन लगवाने लगीं। वो इंजेक्शन बेहद दर्दनाक होते हैं,एक या दो इंजेक्शन के बाद मामा ने कह दिया कि वो खुद जाकर इंजेक्शन लगवा लिया करेंगें नानी को परेशान होने की जरूरत नहीं है।उन्होंने इंजेक्शन का कॉर्स पूरा नहीं किया, इससे रैबीज वायरस उनके शरीर में पनपते रहे।उनके कॉलेज का टूर आगरा गया वहां रस्ते में यमुना नदी के अथाह जल को देख उन्हें दौरा पड़ गया( रैबीज में जल देख कर फिट पड़ते हैं) उनकी बुरी हालत हो गयी जीभ बाहर लटकने लगी, प्रत्यक्ष दर्शियों का कहना था कि उनकी शक्ल भी कुत्ते जैसी लगने लगी थी। आनन फानन में उन्हें अस्पताल ले जाया गया वहाँ डॉ ने उन्हें एक इंजेक्शन दिया उसके बाद वो चिरनिद्रा में लीन हो गये। कक्कू मामा सभी मामाओं में से बच्चों को बहुत प्यार करते,अपनी बाइक पर घुमाते ,77 (कोला) पिलाते तथा अन्य कई मनोरंजन करते। उनके जाने का ख़ालीपन बहुत समय तक सबको सालता रहा, शायद बहुत समय से भी अधिक किन्तु वक़्त के गुजरने के साथ  हम दुःखद स्मृतियों का जिक्र करना बंद कर देते हैं तथा उस दुःख के साथ जीना सीख जाते हैं।

Tuesday, 29 May 2018

विषधर से सामना(१९)

विषधर से सामना(१९)
   सन्ध्या समय माँ रसोई में व्यस्त,दोनों भाई पढ़ाई में,मेहंदी ने सोचा टीवी देखा जाये जैसे ही टीवी के पास गई उसके नीचे पीत मोटी रज्जु जैसा हिलता डुलता कुछ दिखा उत्सुकतावश माँ को आवाज दी देखो यहाँ क्या है, माँ और भाई भागे आये,मम्मी चिल्लाई जल्दी से बच्चों बेड पर चढ़ जाओ ये नाग है।नाग? ये जीव पहली बार देखा।मेहंदी की उत्सुकता और बढ़ गयी।माँ की आज्ञा का पालन करते हुए तीनों बेड पर चढ़ सर्प को निहारने लगे।मम्मी ने किसी को बुलाया और नाग दिखाया।उसने कहा ये तो विषैला सर्प है सपेरा बुलाना होगा वो ढूंढ कर सपेरा लाया,सब बच्चों को दूसरे कमरे में भेज कर उसने बीन बजाई,जब बच्चे बाहर आये तो सर्प बोतल में बंद था।सपेरे ने बताया ये बेहद जहरीला साँप है।यदि डस लेता तो बचना मुश्किल था।सांप व इनाम लेकर वो चला गया।जब पापा आये तो उन्होंने मेहंदी को खूब शाबाशी दी कि अनजान जीव देख उसे छुआ नहीँ वरन मम्मी को बुला लिया।फिर एक किताब में साँप के कई फोटो दिखाये और तरह तरह के सर्पों की जानकारी दी।उनके जहर व काटने से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में भी बताया।

Friday, 25 May 2018

विभिन्न पशुओं से परिचय(१८)

         विभिन्न पशुओं से परिचय(१८)
     बंदर से तो आम का धमाल हो ही चुका था।एक बार पूरा परिवार आँगन में बैठा हुआ गोलगप्पे खा रहा था,मेहँदी धीरे धीरे खा रही थी और सारा परिवार अंदर चला गया,एक बन्दर जल्दी से आया और सभी की तरह पानी में डुबो कर गोलगप्पे खाने लगा मेहंदी उसे इंसानों की तरह खाते देखती रही ना तो किसी को बन्दर भगाने बुलाया और ना ही अपने हिस्से के गोलगप्पे समाप्त होने की चिंता की।एक दिन एक लड़की घर आई उसका हाथ बुरी तरह फ्फका हुआ था पता लगा बिल्ली ने काटा था।उसे देख अजीब सी अनुभूति हुई।एक मरीज आया जिसे कुत्ते ने काट लिया था,उसको इंजेक्शन लगवाने की सलाह मिली ,14 सुई, अरे बाबा रे,मेहंदी को तो एक सुई से ही डर लगता था।उससे कड़वी गोलियां नहीं नहीं निगली जाती थीं, कभी बुख़ार आने पर जबरन खिलाईं जाने पर वो उलटी कर देती थी,तब पापा सिरींज भर लेते और ना ना करने पर भी उसे सुई लगवानी ही होती थी।वो तो पापा के प्रति उसका स्नेह होता था जो इंजेक्शन का दर्द सहन कर लेती थी क्योंकि उसके बाद डॉ साहब उसको कोई अच्छी सी चीज दिला कर उसके लाड़ भी करते थे।इसके अतिरिक्त मधुमक्खी, मक्खी,मच्छर तथा विद्यालय जाते हुए रस्ते में दिखने वाले मुर्गे,सूअर,गाय, भैंस,बकरी ,तितली तथा कई चिड़िया ,कौवे,तोते व विभिन्न पशु पक्षियों को मेहंदी पहचानने लगी थी,किसी को देख सिहर जाती थी एवं किसी को देख खुश हो जाती थी।कुल मिला कर प्रकृति की विभिन्नता से परिचय प्राप्त हो रहा था। 

Saturday, 31 March 2018

२६जनवरी का कार्यक्रम(१७)

२६जनवरी का  कार्यक्रम (१७)
   मेहंदी ने खूब उत्साहपूर्वक घर पर बताया कि वो सरस्वती वंदना में सबसे आगे खड़ी होगी और एक और सामूहिक नृत्य में उसे चुना गया है,प्रतिदिन विद्यालय में अभ्यास भी कराया जायेगा।घर पर भी वो अभ्यास के दौरान बताये गये स्टेप्स दोहराती रहती।एक दिन पापा ने कहा पढ़ाई पर भी ध्यान देती रहना परीक्षा के दिन नृत्य काम नहीं आयेगा।मेहंदी के दिल को बात लग गयी वो पहले की तरह जीजान से पढ़ाई में लग गयी।एक शाम विद्युत आपूर्ति ना होने पर वो मोमबत्ती जला कर पढ़ रही थी ,पढ़ते पढ़ते इतनी लीन हो गयी कि उसके खुले केश मोमबत्ती की ज्वाला से झुलसने लगे उसे पता ही ना चला,बड़े भाई किसी कार्य से आये और चिल्ला उठे मेहंदी के बालों में आग लग गयी और जल्दी से मेहंदी को मोमबत्ती से परे किया।आग से कोई अन्य नुकसान तो नहीं हुआ किन्तु एक तरफ के बाल बहुत जल गए तब मम्मी ने आव देखा ना ताब झट से मेहंदी का मुंडन करा दिया।अगले दिन स्कार्फ़ पहना कर विद्यालय भेज दिया।मैम ने जब अभ्यास कराना शुरू किया तो स्कार्फ उतारने को बोला मेहंदी के नानकुर करने पर खुद ही स्कार्फ़ खींच दिया और गंजा सर देख कर आवक रह गईं।विद्यालय की  छुट्टी होते ही मेहंदी के घर गयीं और बोलीं भाभीजी ये क्या कर दिया मैंने तो सुन्दर होने के कारण इसे सबसे आगे खड़ा किया था,अब गंजी लड़की कैसी लगेगी,आप ने ये क्या किया, अब तो इसे कार्यक्रम में नहीं रख पाऊँगी। मम्मी ने पूरी बात बताई तो मैम सर ठोंक कर रह गईं।मेहंदी को पढ़ाई में तल्लीन होने की सज़ा पूरे दिन स्कार्फ़ पहनने तथा कार्यक्रम से बाहर होने की मिली।

Sunday, 25 March 2018

उतना लीजिये थाली में ,जो ना जाये नाली में(१६)

"उतना लीजिये थाली में ,जो ना जाये नाली में"

     मेहंदी के बाबा उसके चाचाजी व चाची जी के साथ पुश्तैनी घर में रहते थे कुछ दिनों के लिए रहने आये।सब बच्चे बाबा से खूब खुश थे उनसे तरह तरह की बातें करते,मेहंदी तो मितभाषी थी बाबा से कम ही बोलती।बाबा भी उसे कम ही तजव्वो देते थे।बाबा की एक अजीब आदत थी जब वो खाना खाते तो ख़ूब बड़े बड़े ग्रास प्रत्येक सब्जी से निकालते थे।मेहंदी की मम्मी हमेशा से खाना ना छोड़ने और जितना खा सकते हो उतना ही लेने की सलाह देती थीं।सभी सदस्य इसका पालन भी करते थे,अपवाद स्वरूप ही कभी भोजन कोई थाली में छोड़ता था।बाबा को ऐसा करते देख उसके मुख से निकल गया कि बाबा तो आधा खाते हैं आधा बर्बाद करते हैं,बसजी बाबा का पारा चढ़ गया जरूर इसकी माँ ने सिखाया होगा वरना ये तो बोलती ही नहीं है।गुस्से में उन्होंने खाना खाने से भी इंकार कर दिया।मम्मी मनाती रह गयी पर वो मुँह फुलाये बैठे रहे
डॉ साहब के आने पर उन्हें सब बताया।अपनी लाड़ली के लिए तो वो कुछ सुन ही नहीं सकते थे उन्होंने अपने पिताजी को समझाया कि शशी बच्चों को खाना बर्बाद करने को मना करती है वही मेहंदी ने सीखा है, ग्रास निकलते हुए उसने पहली बार देखा तो उसे लगा आप खाना छोड़ रहे हो,इसलिए ऐसा कह दिया फिर मम्मी से नई थाली परोस कर लेन को कहा और प्रेम से अपने सामने खिलाया तब बाबा माने।बूढ़े बच्चे एक समान होते हैं इसलिये ही कहा जाता है।मेहंदी अपने बाबा से थोड़ा और सहमी रहने लगी कि कहीं मुँह से गलत ना निकल जाये तथा ये भी सोचती रही कि गलती तो उसकी थी पर बाबा अपनी बहू से इतना नाराज़ क्यों हुए,आखिर किसी की भी गलती का ठीकरा बहू के ऊपर ही क्यों फूटता है।

Monday, 19 March 2018

बुद्धधु बक्से से लगाव (१५)

           बुद्धधु बक्से से लगाव (१५)
    घर में आते ही सबका चहेता बन गया बुद्धधु बक्सा।मेहंदी तो संध्या समय जब कार्यक्रम आते तभी विद्यालय से मिला गृहकार्य करती।लिखते लिखते टीवी के बिलकुल पास पहुँच जाती तब डॉ साहब को समाचार देखने में व्यवधान होता और वो चुटकी लेते अरे बेटी ज़रा दूर से टीवी देखो वरना प्रतिमा पुरी टीवी में खींच लेगी।मेहंदी वाकई में डर जाती उसे लगता पापा कह रहे हैं तो सच ही होगा।मेहंदी को प्रतिमा पुरी कोई मदन पुरी नामक फ़िल्मी खलनायक की बहन ही लगती थी बाद में तो अमरीश पुरी का पर्दापण भी फिल्मों में हो गया पहले हो गया होता तो दोनों की ही बहन लगतीं। फिर तो नये नये टीवी एंकर व समाचार वाचकों को मेहंदी पहचानने लगी और वो सब रोज के जीवन का एक हिस्सा ही बन गये।रोज रात का खाना टीवी के सामने ही होता, चित्रहार या फिल्म तो सप्ताह में एक ही बार आते थे रोज के समाचार तथा कृषिदर्शन भी देख लिए जाते थे।शायद वो कार्यक्रम देखने से अधिक चलती व बोलती तस्वीरों की दीवानगी होती थी।कवि सम्मेलन या क्रिकेट मैच देखने का शौक भी पापा के साथ साथ मेहंदी को भी हो गया।लेकिन पढ़ाई में कोई कोताही नहीं होती थी,कभी भी अधूरे या गलत काम के लिए अध्यापिका से मेहंदी डाँट नहीं पड़ी।कुल मिला कर बुद्धधु बक्से के साथ रह कर डॉ साहब के बच्चे बुद्धधु नहीं बन रहे थे।